पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/२४९

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तूती मैना

और चिकना था। दीर्घ भुजायें, चौड़ी ऊँची छाती, चटकीला चेहरा, कसरत से कसी हुई देह और प्रशस्तोन्नत ललाट-सभी अवयव मनोहर थे। मोतियों से गुंथी सोने की गोल-गोल बालियाँ कानों में पड़ी थीं। कानों तक फैले हुए नेत्र यों सोहते थे, मानों मुक्ता-फल उगलती हुई सीपियों के मुख चलित-पत्र-युक्त पद्म चुम्बन कर रहे हों। तूती के योग्य ही सुवर्ण-घटित-प्रेम-पञ्जर मिल गया! सोने के पींजरे में सोने की चिड़िया बन्द हो गई!

वन के तोते जब पींजरों में बन्द होकर जन-समुदाय में आते हैं, तब पाण्डित्य प्राप्त कर अपना जीवन आदर्श बना लेते हैं। सुन्दर सरोवरों में चाहे कितना ही सुन्दर सरोज क्यों न खिले; पर जब तक भगवान् शशिशेखर के मस्तक पर वे नहीं चढ़ते, तब तक उनका संसार में होना न होना, दोनों बराबर रहता है। जो वन ही में फूलते और झर जाते हैं, उन पुष्पों का उपयोग ही क्या है? कण्व-कन्या यदि दुष्यन्त की हृदय-सर्वस्वा नहीं हुई होती, तो उसके अंक-गगन में भरत-सरीखे पुत्र-पूर्णेन्दु के दर्शन पाकर संसार किस प्रकार पुलकित होता? 'महाकवि' का 'शाकुन्तल' ही आज क्यों संसार में सर्वोच्च आसन पाता?

ठीक है-जिसने चन्द्रमा को सुन्दर बनाया, उसी ने चकोर के हृदय को भी प्रेममय बना दिया। जिसने मेघ को श्याम-सुन्दर बनाया, उसी ने बिजली को भी व्रज-बाला बना दिया! फूल बनाने वाले ने ही भ्रमर के छोटे से हृदय केन्द्र में अगाध प्रेमसागर उमड़ाकर 'गागर में सागर' भर दिया!