पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/२७२

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गल्प-समुच्चय

शरीर पर मुग्ध होकर, आनन्द से, कामासक्त होकर मुस्करा रही है। पर आपकी यह भूल थी। वास्तव में उस दिन आपने मेरी ओर कुछ ऐसे विलक्षण भाव से देखा था-आपके नेत्र विस्फारित, आपका मुख विवृत, आपकी आकृति विकृत एवं आपकी चेष्टा कुतूहलमयी थी—मुझे सहसा मुस्कराहट आ गई। सच मानिये, मैंने उस दिन आपके मुख पर मूर्खत्व का प्रोज्ज्वल नृत्य देखा था—बस इसीलिए मैं मुस्करा पड़ी और पण्डित-प्रवर साहित्याचार्य श्रीमान् प्रोफेसर सत्येन्द्र एम० ए०, पी० एच० डी० महाशय ने उसका जो अर्थ लगाया उससे उनको मिट्टी पलीत हुई सो तो हुई, मुझ निरपराधिनी को भी व्यर्थ में आत्मग्लानि सहनी पड़ी।

जीजाजी! आपने अपनी सरल सती स्त्री के प्रति विश्वासघात किया है। आपको इसका प्रायश्चित्त करना चाहिये और अपने इस महा कुत्सित आचरण के लिये उस पुण्यमयी देवी से क्षमा माँगनी चाहिए। इसी में आपका कल्याण है।

जीजाजी! रमणी पुष्प की भाँति मधुर, रत्न की भाँति प्रभामयी, प्रभात-तुषार-कण की भाँति पवित्र, आत्मा की भाँति प्रकाशमयी, साधना की भाँति तपोमयी एवं भगवती शक्ति की भाँति पुण्यमयी है; अत: आपको अपने कल्याण के लिये इस बात का ध्यान रखना परम आवश्यक है कि आप उसके हृदय-सागर को अपने घृणित आचरण से उद्वेलित न करें; क्योकि उसके।अन्तर में ऐसी वड़वाग्नि निहित है, जिसमें अपनी समस्त सृष्टि के समेत स्वयं भगवान तक भस्मावशेष हो सकते हैं।