पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/२९४

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गल्प-समुच्चय

से हिलमिलकर नृत्य करने लगा। बिहारी इस अलाप से भली-भाँति परिचित थे। यह श्यामा के कोमल कण्ठ से निकली हुई अलाप थी। यह वह अलाप थी, जिसे सुनते ही बिहारी आनन्द से विह्वल होजाते, जी चाहता, कि इसे कलेजे में बिठा लें और हृदय-तन्त्रियों में सदा के लिए बन्द कर लें; किन्तु आज वही अलाप उनके हृदय में शूल चुभा रही थी! पहले यही अलाप बिहारी के लिये प्रेम और हर्ष का सन्देश होती थी; परन्तु आज यही अलाप श्यामा की वेवफ़ाई की स्पष्ट घोषणा थी। बिहारी ने फिर ज़ोर से दरवाजा खटखटाया; लेकिन फिर भी किसी ने जवाब न दिया। उन्हें बड़ा क्रोध आया। जी तो यही चाहता था, किसी तरह किवाड़ खुलवाकर अन्दर जायें और श्यामा को खूब फटकारें, लेकिन इसमें बदनामी-ही-बदनामी हाथ रहती। बिहारी उलटे पाँव लौटे और सड़क की ओर चले। घोर हार्दिक वेदना की दशा में सोचते चले जाते थे—यह है दुनियाँ का रङ्ग। जिसके साथ प्रेम करो, वही गला काटने को तैयार हो जाता है। यही है, श्यामा जिसके प्रेम की कहानियाँ सुनते-सुनते कान पक गये । आज तोते की तरह नज़र फेर ली। मुझे आने में ज़रा-सी देर हो गई, इसने यहाँ यारों को अन्दर दाख़िल कर लिया। इसके लिये मैंने क्या उठा रक्खा, इसके पीछे मैंने क्या नहीं बिगाड़ा? धन, दौलत, रियासत—सब खाक में मिल गई; लेकिन फिर भी इसका मुँह सीधा न हुआ। महीने में तीन-चार सौ देता था; फिर भी इसकी फरमाइशें बनी रहती थीं, लेकिन मैंने कभी शिकायत नहीं की।