पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/२९६

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गल्प-समुच्चय

आखिर वह गई कहाँ? कुछ समझ में नहीं आता। बिहारी इसी उलझन में फंसे हुए एक कोच पर आकर लेट गये। वे इस दशा में दस मिनट रहे होंगे, कि उन्हें किसी गाड़ी के पहियों की आवाज सुनाई दी। वे झपटकर बाहर आये।

उमा गाड़ी से उतर रही थी और एक सफ़ेदपोश महाशय बँगले से बाहर जा रहे थे। बिहारी ने उमा से पूछा—कहाँ से आ रही हो?

"सिनेमा देखने गई थी।"

"और कौन साथ था?"

"रतन थे।"

"तुमने मुझे नहीं बताया, कि सिनेमा देखने जाओगी?"

"क्या तुम मुझे अपनी सारी बातें बताया करते हो?"

बिहारी निहत्तर हो गये। आज वे स्वयं अपनी दृष्टि में दोषी थे।

(५)

प्रतिक्रिया आरम्भ हो चुकी थी। बिहारी अब विशेषतः घर ही पर रहते थे। उनका हृदय एक बार फिर दाम्पत्य के सरल सुखों के लिये लालायित हो उठा; किन्तु वे जितना प्रेम करने का प्रयत्न करते, उमा उनसे उतना ही दूर भागती। उसे उनसे डर-सा लगता था—उनसे मिलने में अधिक वेदना होती थी। अब वह उन्हें अपना शुद्ध विमल प्रेम नहीं दे सकती थी। उनका उसके शरीर पर अधिकार अवश्य था; किन्तु उसका स्वतन्त्र हृदय