पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/३००

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गल्प-समुच्चय

पर नशा उतरने के बाद हो जाती है। आत्मिक वेदना भी थी, पश्चात्ताप भी था। मानसिक अशांति की दशा में सोचते थे——

उमा ने मन में क्या सोचा होगा? कहीं मुझे चरित्रहीन न समझने लगे। उसने कुछ कहा नहीं, चुपचाप बाहर चली गई-इसका क्या मतलब है? उसने ज़रूर बुरा माना होगा। मुझसे बड़ी ग़लती हुई, मुझे उस समय न-जाने क्या हो गया था। उमा से आँखें मिलाकर अब कैसे बातें करूँगा? नहीं, अब मैं वहाँ कभी न जाऊँगा। रतन इसी उलझन में बड़ी रात तक जागते रहे। अन्त में निद्रादेवी को उनकी शोचनीय दशा पर दया आ गई।

रतन ने उमा के यहाँ न जाने का आज पहली ही बार सङ्कल्प न किया था। उनके इस प्रकार के इरादों का मूल्य सिद्ध हो चुका था। वे इस बात से स्वयं लज्जित थे।

वाटिकावाली घटना को कई दिन बीत गये। रतन ने अभूतपूर्ण दृढ़ता दिखाई—सङ्कल्प में शिथिलता न आने दी। इस बीच में उमा के पास से कोई बुलावा न आया। रतन का यह सन्देह कि उमा मुझपर नाराज़ है, ज़ोर पकड़ता जाता था। उनकी मानसिक अशांति बहुत कुछ घट गई थी। उन्हें थोड़ा-बहुत दुःख अवश्य था; किन्तु वे मन को इस प्रकार समझाते—चलो अच्छा हुआ, बला से जान छूटी। अब बात छिपी रह जायगी। मुझे अपनी भूल भी मालूम हो गई; नहीं तो न जाने कब तक धोखे में रहता—साधारण सहानुभूति को प्रेम समझ बैठा, कितनी बड़ी नादानी थी।