पृष्ठ:गल्प समुच्चय.djvu/७७

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अँधेरी दुनिया

"बड़े कठोर हो।"

कुछ उत्तर न मिला, मेरा कलेजा धड़कने लगा। ख़्याल आया, कहीं बुरा मान गये हों। मैंने क्षमा माँगनी चाही; परन्तु किसी दैवी शक्ति ने जीभ पकड़ ली। उन्होंने थोड़ी देर ठहरकर कहा––"रजनी!"

मैंने यह शब्द उनके मुख से सैकड़ों बार सुना था, परन्तु जो बात इसमें आज थी, वह इससे पहले कभी न थी। स्वर काँप रहा था। जैसे सितार के तार हिल रहे हों। उनमें कैसी मिठास थी, कैसी मोहनी और उसके साथ मिली हुई विकलता और प्रेम। मेरी आत्मा पर मद-सा छा गया। एक क्षण के लिए मैं भूल गई कि मैं अन्धी हूँ। ऐसा जान पड़ता था कि मैं आकाश में उड़ी जा रही हूँ और मेरे चारों ओर कोई मधुर संगीत अलाप रहा है। यह क्षण कैसा सुखद, कैसा अमोलक था, उसे मैं आज तक नहीं भूल सकी। आठ वर्ष बीत चुके हैं। इस सुदीर्घ काल में कई अवसर ऐसे आये, जब मैंने यह अनुभव किया कि मेरी आत्मा इस आनन्द के बोझ को सहन न कर सकेगी; परन्तु यह अवसर उस एक क्षण के आनन्द के सामने तुच्छ है, जब मुझे यह ख्याल न रहा था कि मैं अन्धी हूँ, और मेरी आँखें दुनिया की बहार देखने से वंचित हैं। एकाएक मुझे स्थान, समय और अपनी अवस्था का अनुभव हुआ। मैं अपनी लज्जा के बोझ तले दब गई और आत्मा की पूरी शक्ति से केवल एक शब्द बोल सकी––

"क्यों?"