पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/११०

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मौलवी मुहम्मद हुसेन आज़ाद सिला शुरू करता है । इरादा है कि अब इसे खत्म ही करके छोड़ा जाय, चाहे इसमें कितनी ही गलतियां क्यों न रह जाय। राकिमको जो अक़ी- दत हजरत आज़ादसे है, उससे मजबूर है कि अपनी तरफ़से इस काम- को एक दफ़ा पूरा कर दे। आह बेदर्दी! पूछनेपर कोई जवाब तक नहीं देता। लाहौर में मौलाना आजाद राकिमकी कम उमरीका लिहाज न करके अदना-अदना८ बातोंका माकूल-से-माकूल जवाब देते थे। जबानी ही नहीं, बल्कि लिखकर देते थे। कितनी ही बात अपनी खुशी- से लिख देते थे। एक-दो किताबोंका रीव्यू तक उन्होंने लिख दिया था। वह अगर इस वक्त मेरे दिलकी बेताबी९ जान सकते तो खुद अपनी जिन्दगीके हालात लिखकर भेज देते और अपना ताजा फोटो खिचवा- कर भेज देते, चाहे इन्हें फोटो खिचवानेका शौक़ भी न होता। मगर उनके शागिर्दी और उनके नाम लेनेवालोंने मुझे बिल्कुल मायूस किया। हज़- रत आज़ादकी तसवीर जो पहिले मज़मूनके साथ 'जमाना में निकली, उसपर भी कुछ एतराज १० हुए हैं। कहा गया है कि उसमें आंख दुरुस्त नहीं हुई हैं। ऐसा होना मुमकिन है। वजह यह है कि जो फोटो मेरे पास है, वह पुराना हो जानेसे बहुत फोका हो गया है । उसीसे वह तैयार कराई गई है और बहुत कोशिश इस बातकी की गई है कि अच्छी बने। तब वह इस हैसियतसे निकली, नहीं तो और भी कुछ कसर रह सकती थी। यह फोटो जुबलीके वक्तका है, जबकि हज़रत आजाद शम्स-उल-उल्मा हुए थे। वही लिबास भी है। लाहौर में “मखजन के चलानेवालोंने भी एक तसवीर विलायतसे बनवाकर मंगवाई है, मगर वह भी इससे बेहतर नहीं है । उसमें क़द अन्दाज़ काबिले गौर है । उम्मेद है कि वह तसवीर सब तरह उम्दा होगी, जो आगा मुहम्मद इब्राहीम साहबने बनबाई है और जो 'आबेहयात' और 'दरबार अकबरी के साथ ७-प्रेम श्रद्धा। ८-छोटी-छोटी, मामूली। ९-घबराहट । १०-आक्षेप । [ ९३ ]