पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१२१

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गुप्त-निबन्धावली चरित-चर्चा बेशी होती रहती है। आजकल इनमें एक हिस्सा नज्मका भी दाखिल हुआ है। जिससे आज़ादका कुछ ताल्लुक नहीं है । इस तरह कटते छटते इनकी शक्लं ऐसी बदल जायंगी कि इनको तसनीफात आज़ाद कहना बेफ़ायदा हो जायगा । सरिश्ता तालीमकी खास किताबों पर मुसन्नफ़३९ या मुवल्लफका नाम नहीं होता-उसके मुताबिक़ इन किताबोंपर भी हजरत आज़ादका नाम नहीं है। नावाकिफ़ तो जान ही नहीं सकता कि यह किसकी मेहनत है। वाकिफ़ भी कुछ दिनोंमें भूल जायगे। क्या इसका कुछ इलाज नहीं है ? -ज़माना जून १९०७ ई० । --रेखक। ४०-संग्रहकार । [ १०४ ]