पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१२३

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गुप्त-निबन्धावली राष्ट्र-भाषा और लिपि उसका नाम “हिन्दी” भी मुसलमानोंका रखा हुआ है । हिन्दी फारसी भाषाका शब्द है। उसका अर्थ है, हिन्दसे सम्बन्ध रखनेवाली अर्थात हिन्दुस्थानकी भाषा । ब्रजभाषामें फारमी, अरबी, तुर्की आदि भाषाओं- के मिलनेसे हिन्दीकी मृष्टि हुई। उक्त तीनों भाषाओंको विजेता मुसलमान अपने देशोंसे अपने साथ भारतवर्षमें लाये थे। सैकड़ों माल नक मुसलमान इम देशमें फारसी बोलते रहे। फारिसके विजेताओंहीका इस देशमें अधिक बल रहा है। अरबी, तुर्की बोलनेवाले बहुत कम थे। जब इन लोगोंकी कई पीढ़ियों इम देशमें बसते हो गई तो इस देशकी भाषाका भी उनपर प्रभाव हुआ। भारतकी भाषा उनकी भाषामें मिलने लगी और उनकी भाषा भारतकी भापामें युक्त होने लगी। जिस समय यह मेल होने लगा था, उसे अब छः सौ वषसे अधिक होगये। आरम्भमें उक्त मेलजोल सामान्य-सा था। धीरे- धीरे इतना बढ़ा कि फारसी और ब्रजभाषा दोनोंके संयोगसे एक तीसरी भाषा उत्पन्न होगई। उसका नाम हिन्दी या उर्दू जो चाहिये सो समझ लीजिये। फारमी-भापाके कवियोंने इस नई भाषाको शाहजहानी बाजार में अनाथावस्थामें इधर-उधर फिरते देखा। उन्हें इसकी भोली- भाली सूरत बहुत पसन्द आई। वह उसे अपने घर लेजाकर पालने लगे। उन्होंनेही उसका नामकरण किया और उसे रेखता कहकर पुकारने लगे। औरङ्गजेबके समयमें उक्त भाषामें कविता होने लगी। मुहम्मदशाहके समयमें उन्ननि हुई और शाहआलम सानीके समयमें यहाँ तक उन्नति हुई कि बहुत अच्छे-अच्छे कवियोंके सिवा स्वयं बादशाह उक्त भाषामें कविता करने लगे और एक नामी कवि कहलाये । कितनेही हिन्दू कवि भी इस भाषामें कविता करने लगे। साधु महात्माओंके कुटीर तक भी इसका प्रचार होने लगा, वह अपने भगवद्भक्तिके पद इस भापामें रचने लगे। । १०६ ]