पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१३२

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हिन्दी-भाषा “सुज' 'शख' जात 'उजबक्क' नाम, मीरां प्रधान पुनि युद्धधाम । चालीस दून जिन पीठ ढाल, चालीस दून उर कंठ माल । पञ्चास दृन पहरे कवन, पञ्चीस दृन सिर टोप रञ्च । चकमार पंच मणको उदार, 'हजार' 'तीर' जिहिं माथ भार । “कब्बान' पकर ‘उजबक' 'पीर', दो एकोस पै न चूकत्त तीर । परे रहे ग्न खेत अरि, करि दिल्लिय मुग्व कपरव' । जीत चल्यो पृथीराज रन, मकल सूर भय मुफ्व । बर गोरी पद्मावती, गहि गोरी सुलतान' । निकट नगर दिल्ली गये, चत्र भुजा चहुआन । मत्तर सत तिय अग्ग, वीर गजराज सुअप्पिय । जे लीन्हें 'सुरतान', 'साहि' डोरी गोरी किय । पंच सत्त पञ्चास, एक सो तुंग तुरंगम । मौदासी चतुरंग, सत्त ढोलिय बहु चंगम । चतुरंग लच्छि चित्रंग दे. बर सोमेमर थप्पिये। बोलाइ सजन रावर समर, पंच कोस मिलि जंपिये । मरी जे भाभी इण हासे । चोर निदाणेके नासे ॥ राव जुड़ा सुण बेननी बोलन पादो लेह । का भुद्र का भाटिये कोट अडावण देह । डिन यीनै अत्त देबरानु रवा कहे। जग रहासी बन नत अनीत ना कीजिये। खिर बिरजेवा गह मोत भला ना भाटिया । जे गुण क्रिया रवाह तेही कलार हारिया ॥ [ ११५ ।