पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१४६

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हिन्दी-भाषा वीणासे सितार इसी सुयोग्य पुरुषने बनाया। राग-बहार और कितनीही चीजें बनाई। वसन्तका मेला चलाया। बड़ा रंगीला रसीला आदमी था। आनन्द जहाँसे मिलता था, वहींसे लेलेता था। मुहल्ले के सिरे पर एक बुढ़ियाकी दुकान थी, नाम था उसका चिम्मो। शहरके आवारा लोग वहां बैठकर भंग, चरस आदि पिया करते थे । जब खुसरू दरबारसे फिर कर उसकी दुकानके सामनेसे निकलता या और किसी कारण उधरसे आना होता तो चिम्मो भी उसे सलाम करती और कभी कभी हुक्का भर कर सामने ले खड़ी होती । खसरू भी उसका मन रखनेको दो एक बूंट पीलेता था। एक दिन उसने कहा-बलालं, हजारों गजल, गीत, राग- रागनी बनाते हो, किताब लिखते हो, कोई चीज लौंडोके नाम पर भी बनादो। खुसरूने कहा वी चिम्मो अच्छा। एक दिन उसने फिर कहा कि भटियारीके लड़के लिये खालिकवारी लिखदी। जरा लौडीके नाम पर भी कुछ लिग्वदोगे तो क्या होगा ? आपकं सदकसे हमारा भी नाम रह जायगा। उसके बार बार कहनेसे एक दिन ध्यान आगया तो कहा कि लो, बीबी चिम्मो सुनो- औरोंकी चौपहरी बाजे चिम्मोकी अठपहरी । बाहरका कोई आवे नाही आवं सारे शहरी । साफ सूफ कर आगे राखे जिसमें नाहीं तूसल । औरोंके जहां सींक समाव चिम्मोके वहाँ मूसल । उस जमानमें बादशाहके चौपहरी नौबत बजा करती थी । खुसरू कहता है कि चिम्मोके अठपहरी बजती है अर्थात् यह बादशाहसे भी बड़ी है। इसकी दुकान आठां पहर चलती है, उसपर जंगलो गंवार नहीं, सब शहरी आते हैं। भंगका प्याला साफ करके सामने रखती है, जिसमें कोई तिनका नहीं दिखाई देता। भंगड़ लोग गाढ़ी भांगकी तारीफमें कहा करते हैं कि ऐसो जिसमें सींक खड़ी रहे। खसरू अत्युक्ति करके [ १२९ ] ह