पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१६२

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बज भाषा और उर्दू 'तुमनाने' इत्यादि शब्द इसमें आये हैं। दक्षिणी उद्धृमें ऐसे शब्द अब भी हैं। किन्तु बोलनेमें अधिक हैं, लिखनेमें कम । ' एक मरसियेमें सौदाने उर्दू में दोहे लिखे- कैसा हो मखलूकको, बड़ा बनावे रब्ब । जो कम्मोंमें है लिखा, सो मिटता है कब्ब ।। तन घायल हो तेगसे, सीस उतारा जाय । पूत ऐसेका होय कर, प्यासा मारा जाय ॥ मझधारमें आनकर, ऐ हकके महबूब । किश्ती तेरी यक बयक, गई लहूमें डूब ।। पण्डित श्रीधर पाठकके "एकान्तवासी योगी" में दो दो चरण लावनी छन्द और दो दो दूसरे ढङ्गके हैं । सौदाने एक मरसियेमें लावनी छन्दको यों बरता है.-- ऐसी नींद कहाँसे आई दूधभी मांग न रोये तुम । कन्धेसे लग बापके अपने सोये सो बस सोये तुम ।। सोधी हिन्दीका एक और नमूना - करती थी मैं तुझको प्यार । होती थी यह जान निसार । तू मेरा था गलेका हार । किनने डाला तुझको मार ।। उर्दू भाषा, रोला और दोहा छन्दमें सौदाने मरसिया लिखा है । खड़ी बोलीमें जो लोग ब्रजभाषाके बरते हुए छन्दोंको वरतना चाहते हैं, उनके लिये यह कोई सवा सौ साल पहलेका नमूना है :- सुनो मुहिन्यो बात कहूँ मैं तुमसे रोओ । गम है शहका आज खुशीको दिलसे धोओ। जिसको जगमें लोग कहे थे दीनका सुलता । सीस कटा अब उसका तन है खूनमें गलतां ।। कहता हूँ मैं अब तुम्हें मुखपर खाक लगाय । [ १४५ ]