पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१७४

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भारती भाषा हिन्दी बोलनेकी चेष्टा करता है। इससे उनका मतलब भी निकल जाता है। उस तरह न चीनी अरवी बोल सकता है, न अरव चीनी । जब उदयपुरमें रेल न थी तो हमको एकवार नाथद्वारे जाना पड़ा था। भीलवाड़से तीन दिन तक बैलगाड़ियों में जाना पड़ा। मार्गमें जिन गांवोंमें हम ठहरते थे, उनकी भाषा कुछ न समझते थे। पर नाथद्वारेमें कुछ दिक्कत न थी। वहां खूब हिन्दी बोली जाती है और वहाँ जो मेवाड़ी है वह भी सरल है। वहाँके गीत तक समझमें आते थे। यही दशा पंजाबमें हुई। लाहोर, अमृतसर, लुधियाना, जालन्धर आदि शहरोंकी भापा सब समझमें आती थी। देहातवालोंकी बात समझने में मगज चकरा जाता था। अधिक क्या मन्द्राज जैसे विकट देशके नगरोंमें भी हिन्दी समझी जाती है और हिन्दीसे काम निकाला जाता है। बङ्गालियोंको या दूसरे प्रान्तवालोंको हम क्या कह सकते हैं, जब स्वयं हिन्दीवालेही देवनागरोसे कोसों दूर भागते हैं। जितने लोग भारतवपमें हिन्दी बोलते हैं, यदि उनमेंसे चौथाई भी नागरी लिख पढ़ सकते तो हिन्दी भाषा सबसे आगे दिखाई देती। पंजाबी लोग देवनागरीको हव्वा समझते हैं। लाहोरके पोस्ट आफिसोंमें कोई नागरी अक्षर जाननेवाला नहीं। हिन्दुस्थानी और खत्री मुड़िया अक्षर लिखते हैं। मारवाड़ियोंके अक्षर भी मुड़ियाके भाई बन्धु होते हैं। सारांश यह कि हिन्दी बोलने वालोंमें अधिक लोग नागरीसे अनभिज्ञ हैं, फिर फ्योंकर हिन्दी फैले ? उर्दूवालोंको देखिये कि उनकी भाषा हिन्दी ही है, उर्दू-हिन्दीमें कुछ भेद नहीं है, इतना होनेपर भी देवनागरी अक्षर न जाननेके कारण हिन्दीसे वह उतनेही दूर हैं, जितने बंगाली और मन्द्राजी। खाली मुसलमानही नहीं, उर्दु जाननेवाले हिन्दू भी बहुधा हिन्दीसे कोरे हैं । [ १५७ ]