पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/१९३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


गुप्त-निबन्धावली राष्ट्रभाषा और लिपि किताबें नागरी हरुफ़में तबआ होती हैं ? बहुत ज़रूरत है कि यही हरुफ़ अब कुल सूबाजात हिन्दमें कबूल किये जायें। यह अमर कुछ भी मुशकिल नहीं हैं। कुल हिन्दकी जुबान हिन्दी और हरुफ़ नागरी होने बहुत ज़रूरी हैं। यह कहकर आपने वह कहानी सुनाई जो बम्बई अहातेमें मरहठी ज़बानका रस्मुलखत बदलनेके मुताल्लिक थी। आपने कहा कि हमारे सरिस्ता-तालीमके डाइरेकरने हमारी जुबानका रस्मुलखत और तलफ्फुज़ बदल देना चाहा था। हमने इसके लिये एतराज़ किया मगर सुनाई न हुई । आखिरकार बम्बई गवर्नमेण्ट तक बात पहुँची, और ज़ाहिर किया गया, ऐसा होनेसे झगड़ा होगा, तब हमारी अर्ज कबूल हुई। ___ कलकत्ताके प्रोफ़ेसर खीरोदप्रसाद विद्याविनोद एम० ए०, मद्रास सलीमके विजय राघवाचार्य बी० ए०, वगैरह आलिम शख्सोंने इसी तरह अपनी-अपनी राय ज़ाहिर की। ___ हम उमीद करते हैं कि जो लोग हिन्दी-उर्दूके लिये झगड़ा करते हैं, वह समझ लेंगे कि हिन्दी वाले क्या चाहते हैं और उनकी क्या गर्ज़ है। उर्दूवालोंसे किसी किस्मका झगड़ा करना वह नहीं चाहते हैं और न उर्दूको नुकसान पहुंचाना चाहते हैं, मगर नागरी हरुफ़ वह सारे हिन्दुस्तानमें जरूर फैलाना चाहते हैं। जिससे संस्कृतसे निकली हुई ज़बान करीब-करीब आ जायें। सब हिन्दुओं और हिन्दुस्तानकी सब जुबानोंको एक करनेके लिये यह कोशिश होती है। हिन्दी और उर्दूको हिन्दू एकही ज़बान समझते हैं और मुसलमान भी पहले उर्दूको हिन्दी ही समझते थे। खासकर देहलीवाले। मगर लखनऊवालोंने इसमें अरबी- के अलफ़ाज़ नाहक ठंस-ठूसकर इसे दूसरी जुबान बना डाला है। ___-"जमाना" एप्रिल और मई सन् १९०७ ई० [ १७६ ]