पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/२४३

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गुप्त-निबन्धावली चिट्टे और खत उस आदमीकोसी है, जिसके एक हिन्दू और एक मुसलमान दो जोरू हों. हिन्दू जोरू नाराज रहती हो और मुसलमान जोरू प्रसन्न। इससे वह हिन्दू जोरूको हटाकर मुसलमान बीबीसे खूब प्रेम करने लगे। श्रीमानके उस लफटन्टको ठीक वैसी दशा है या नहीं, कहा नहीं जा सकता ! पर श्रीमानकी दशा ठीक उस लड़केके पिताकीसी है, जिसकी कहानी ऊपर कही गई है। उधर उसका लड़का ताकमें बैठा नीचे उतरनेके लिये रोता है और इधर उसकी नवीना सुन्दरी स्त्री लड़केको खूब डरानेके लिये पतिपर आंख लाल करती है। प्रजा और “प्रस्टीज” दो खयालोंमें श्रीमान् फंसे हैं। प्रजा ताकका बालक है और प्रस्टीज नवीन सुन्दरी पत्नी--किसकी बात रखगे ? यदि दया और वात्मल्यभाव श्रीमानके हृदयमें प्रबल हो तो प्रजाकी ओर ध्यान होगा, नहीं तो प्रस्टीजकी ओर दुलकनाही स्वाभाविक है। ____ अब यह विपय श्रीमानहीके विचारनेके योग्य है कि प्रजाकी ओर देखना कर्तव्य है या प्रेस्टीजकी। आप प्रजाकी रक्षाके लिये आये हैं या प्रेस्टीजकी ? यदि आपके खयालमें प्रजारूपी लड़का ताकमें बैठा रोया करें और "उतारो, उतारो” पुकारा करे, इसीमें उसका सुख और शान्ति है तो उसे ताकमें टंगा रहने दीजिये, जैसा कि इस समय रहने दिया है। यदि उसे वहाँसे उतारकर कुछ खाने पीनेको देनेमें सुख है तो वैसा किया जा सकता है। यह भी हो मकता है कि उसकी विमाताको प्रसन्न करके उसे उतरवा लिया जाय, इसमें प्रजा और प्रेस्टीज दोनोंकी रक्षा है। ___जो बात आपको भलो लगे वही कोजिये--कर्तव्य समझिये वही कीजिये। इस देशकी प्रजाको अब कुछ कहने सुननेका साहस नहीं रहा । अपने भाग्यका उसे भरोसा नहीं, अपनी प्रार्थनाके स्वीकार होने- का विश्वास नहीं। उसने अपनेको निराशाके हवाले कर दिया है। [ २२६ ]