पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/२५१

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गुप्त-निबन्धावली चिठे और खत काम हुए। भेद इतनाही था कि शिवशम्भुशर्माके बरामदेकी छतपर बून्द गिरती थीं और लार्ड मिन्टोके सिर या छातेपर। ___ भङ्ग छानकर महाराजजीने खटियापर लम्बी तानी। कुछ काल सुषुप्तिके आनन्दमें निमग्न रहे । अचानक धड़धड़ तड़तड़के शब्दने कानोंमें प्रवेश किया। आंख मलते उठे। वायुके झोंकोंसे किवाड़ पुर्जे-पुर्जे हुआ चाहते थे। बरामदेके टीनोंपर तडातड़के साथ ठनाका भी होता था। एक दरवाजेके किवाड़ खोलकर बाहरकी ओर झांका तो हवाके झोंकेने दस-बीम बून्दों और दो चार ओलोंसे शर्माजीके श्रीमुखका अभिषेक किया। कमरेके भीतर भी ओलोंकी एक बौछाड़ पहुंची । फुतीसे किवाड़ बन्द किये, तथापि एक शीशा चूर हुआ। समझमें आगया कि ओलोंकी बौछाड़ चल रही है। इतनेमें ठन-ठन करके दस बजे। शम्माजी फिर चारपाईपर लम्बायमान हुए । कान, टीन और ओलोंके सम्मिलनकी ठनाठनका मधुर शब्द सुनने लगे। आंग् बन्द, हाथ-पांव सुखमें । पर विचारके घोडको विश्राम न था। वह ओलोंकी चोटसे बाजुओंको बचाता हुआ परिन्दोंकी तरह इधर-उधर उड़ रहा था। गुलाबी नशमें विचारों- का तार बन्धा कि बड़े लाट फुर्तीसे अपनी कोठीमें घुस गये होंगे और दूसरे अमीर भी अपने-अपने घरोंमें चले गये होंगे, पर वह चील कहा गई होंगी ? ओलोंसे उनके बाजू कैसे बचे होंगे, जो पक्षी इस समय अपने अण्डे बच्चों समेत पेड़ोंपर पत्तोंकी आड़में हैं या घोसलोंमें छिपे हुए हैं, उनपर क्या गुजरी होगी। जरूर झड़े हुए फलोंके ढरमें कल सवेरे इन बदनसीबोंके टूटे अण्डे, मरे बन और इनके भीगे सिसकते शरीर पड़े मिलगे। हां, शिवशम्भुको इन पक्षियोंकी चिन्ता है, पर यह नहीं जानता कि इस अभूस्पशी अट्टालिकाओंसे परपूरित महानगरमें सहस्रों अभागे रात बितानेको झोंपड़ी भी नहीं रखते। इस समय सैकड़ों अट्टालिकाएं शून्य पड़ी हैं। उनमें सहस्रों मनुष्य सो सकते, पर