पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/२५२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


आशीर्वाद उनके ताले लगे हैं और सहस्रोंमें केवल दो-दो चार-चार आदमी रहते हैं। अहो, तिसपर भी इस देशकी मट्टीसे बने हुए सहस्रों अभागे सड़कोंके किनारे इधर-उधरकी सड़ी और गीली भूमियोंमें पड़े भीगते हैं। मैले चिथड़े लपेटे वायु वर्षा और ओलोंका सामना करते हैं। सवेरे इनमेंसे कितनोंहीकी लाश जहां-तहां पड़ी मिलंगी। तू इस चारपाईपर मौज उड़ा रहा है। __आनकी आनमें विचार बदला, नशा उड़ा, हृदयपर दुर्बलता आई । भारत ! तेरी वर्तमान दशामें हर्षको अधिक देर स्थिरता कहां ? कभी कोई हर्पसूचक बात दम-बीम पलकके लिये चित्तको प्रसन्न कर जाय तो वही बहुत समझना चाहिये। प्यारी भङ्ग ! तेरी कृपासे कभी-कभी कुछ कालके लिये चिन्ता दूर हो जाती है। इसीसे तेरा सहयोग अच्छा समझा है। नहीं तो यह अधबूढा भङ्गड़ क्या सुखका भूखा है । घावोंसे चर जैसे नींदमें पड़कर अपने कष्ट भूल जाता है अथवा स्वप्नमें अपनेका स्वस्थ देखता है, तुझ पीकर शिवशम्भु भी उसी प्रकार कभी-कभी अपने कष्टोंको भूल जाता है ! चिन्ता स्रोत दूसरी ओर फिरा। विचार आया कि काल अनन्त है। जो बात इस समय है, वह सदा न रहेगी। इससे एक समय अच्छा भी आसकता है। जो बात आज आठ-आठ आंसू रुलाती है, वही किसी दिन बड़ा आनन्द उत्पन्न कर सकती है। एक दिन ऐसीही काली रात थी। इससे भी घोर अंधेरी-भादों कृष्णा अष्टमीकी अर्द्धरात्रि । चारों ओर घोर अन्धकार-वर्षा होती थी, बिजली कौंदती थी, घन गरजते थे। यमुना उत्ताल तरङ्गोंमें बह रही थी। ऐसे समयमें एक दृढ़ पुरुष एक सद्यजात शिशुको गोदमें लिये, मथुराके कारागारसे निकल रहा था। शिशुकी माता शिशुके उत्पन्न होनेके हर्षको भूलकर दुःखसे विह्वल होकर चुपके-चुपके आंसू गिराती थी, पुकार कर रो भी नहीं सकती थी। [ २३५ ]