पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/२८६

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उर्दू-अखबार हुई। अखबार जैसा छोटासा था, खबर भी उसमें वैसीही छोटी छोटी होती थीं। यहां तक कि पहले पृष्ठकी खवर एक एक लाइनकी होती थी। वह ढङ्ग आज तक जारी है। इस समय कागजका आकार तबसे दूना है, इससे लाइन भी बड़ी बड़ी हैं। तथापि इतनी चाल बाकी है कि उन बड़ी बड़ी लाइनोंमें भी एक एक लाइनकी खबर आरम्भके पृष्ठ पर दी जाती है। "अग्वबारे आम" आरम्भमें ग्वाली खबरोंका कागज था। इससे उसकी पालिसीका पता लगाना व्यर्थ है। उसमें मदा सामयिक अच्छी अच्छी खबर छपती थीं। ऊपर कह चुके हैं कि पञ्जाबसे शिक्षा विभागके एक कर्मचारी इसके सरपरस्त थे, इसीसे पञ्जाबी सरकार अपने प्रान्तीय स्कूलोंके लिये अखबारे आम बहुत खरीदती थी। छोटे छोटे स्कूलों में भी इसकी एक एक कापी जाती थी। काबुलकी अमीर शर अलीके समयकी लड़ाईके तथा पिछली रूस और झमकी लड़ाईके समयमें अखवारे आमका खूब नाम था, इसी समय हमें पहले पहल अखबारे आमके पढ़नेका अवसर मिला। उस समय इस छोटेसे पत्रने इतना नाम पाया था कि बड़े बड़े अखबारोंके ऊपर छागया था। उस समय यह सच मुच अखबारे आम अर्थात सव्वसाधारणका पत्र बन रहा था। ___ उस समय अखबारे आममें छोटी छोटी खबरोंके सिवाय कुछ लम्बी लम्बी खबर, चुटकले और दिल्लगीकी कविताएं हुआ करती थीं। दिल्लीके पहले दरबारके समय बड़ा अकाल पड़ा हुआ था, तब अकालके विषयकी कई एक कविताएं उक्त पत्रमें अच्छी निकली थीं। कुछ दिन बाद "अखबारे आम” सरकारी स्कूलोंसे बन्द हो गया। उसकी जगह "विक्टोरिया पेपर" नामका स्यालकोटका एक उर्दू पत्र सरकारी स्कूलोंमें जारी हुआ। यह बात स्पष्ट न मालूम हुई कि सरकारी कृपा अखबारे आमके ऊपरसे हटकर विकोरिया पेपरपर कैसे जा पड़ी। उड़ती खबर [ २६९ ]