पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/२९५

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गुप्त-निबन्धावली संवाद-पत्रोंका इतिहास न थी। इसके बाद उक्त पत्र सप्ताहमें एक बारसे दो बार और फिर तीन बार निकलने लगा। आरम्भमें उसने क्या मूल्य रखा था स्मरण नहीं, पर तीन बार निकलनेके समय छः रुपया साल इसका मूल्य था। पर अन्तको सप्ताहमें एक बार निकलने लगा और मूल्य तीन रुपये साल स्थिर किया। कहा कि सप्ताहमें तीन बारकी जरूरत लोग नहीं समझते। इससे डाक महसूलकी किफायत करके पाठकोंको बड़े आकारमें साप्ताहिक पत्र कम मूल्यपर दिया जाना अच्छा है। तबसे उक्त पत्र बराबर साप्ताहिक है और नबहोसे उसकी बात कहनेके योग्य है । उद्दे-दुनियामें “हिन्दुस्तानी" एक नई चालका पत्र हुआ। उसने राज- नीतिको ग्रहण किया और आरम्भहीसे राजनीतिके लेख लिखने आरम्भ किये। राजनोति सम्बन्धी हरेक बातपर कुछ न कुछ हिन्दुस्तानीमें लिखा जाता है। इसके सिवा और जितनी वात आलोचनाके योग्य होती हैं, उन सबपर भी उममें कुछ न कुछ आलोचना होती है। हिन्दु- स्तानीके सालभरके सब पत्र जोड़कर पढ़ लो ; उस सालकी मब जरूरी राजनीतिक और दूसरी जाननेके योग्य बात उसमें मिलगी। उसका फाइल साल भरकी घटनाओंको याददाश्त होता है। उर्दू अखबारोंमें यह बात हिन्दुस्तानीसे पहले पूरी तरह किसीको प्राप्त न थी। हिन्दुस्तानी- के निकलने के बाद कई एक और अखबार भी उसीढंगपर चले हैं, पर अब भी हिन्दुस्तानीकी बराबरी कोई नहीं कर सका है। मंद्राजमें कांग्रस हुई। प्रेसीडण्ट मि० घोषकी पूरी स्पीच हिन्दुस्तानीके एक ही नम्बरमें निकल गयी। और जितनी कामकी स्पीच होती हैं, उन सबका तरजमा बहुधा उसमें निकल जाता है। पालीमेण्टकी वात, विलायतमें हिन्दु- स्तानकी बाबत जरूरी स्पीच, बड़े लाट आदि भारतके बड़े बड़े राजपुरुषों- की स्पीच जितनी भारतवासियोंके जाननेके योग्य होती हैं, उतनी हिन्दु- स्तानीमें प्रकाश हो जाती हैं। जो लोग अंग्रेजी नही पढ़े हैं, वह भारत- [ २८ ]