पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३२२

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उर्दू-अखबार हुए थे, जिनमेंसे कुछ मिट गये और कुछ अब भी हैं। उनमेंसे एक "मुआरिफ" था, जो मखजनके जारी होनेके बाद बंद हुआ। मुसलमानी पत्र था। अरबीके विद्वान उसमें ऐतिहासिक और दार्शनिक लेख लिखा करते थे। मौलाना हालीकी नजमें भी उसमें छपा करती थीं। एक नाविल भी उसमें निकलता था। सन १८६८ ईस्वीसे १६०१ ई० तक उक्त पत्र जारी था। "हसन" नामका पत्र एक सज्जन हसनविन अब्दुल्लाने दक्षिण हैदरा- वादसे जारी किया था। उसके लेखकोंको अच्छे लेख लिखने पर एक अशर्फी उजरत मिलती थी। कई माल होगये यह पत्र बन्द होगया । "अवध-रिवियू" नामका एक पत्र नवलकिशोर प्रेम, लग्वनऊसे कोई छः सात सालतक निकल कर गत वप वन्द होगया। एक प्रकारका अच्छा मासिक पत्र था। "नाइंटीन्थ संचरी” और “ईट एण्ड वेष्ट' आदि अंगरेजी पत्रोंका तरजमा उममें छपा करता था। तरजमा अच्छा होता था। कविता उममें नहीं होनी थी। आधसे अधिक भागमें नाविल होता था। एक तस्वीर और एक जीवनी, भी उसके हर नम्बरमें होती थी। लखनऊहीसे “खदङ्ग नजर" नामका एक मामिक पत्र निकलता है, जिसका ८ वां वर्ष चलता है। आर्थिक दशा अच्छी न होनेसे उसका जुलाईका नम्बर अब तक नहीं निकला है। गत वर्ष भी एक रईसकी उदारतासे उसका पुनर्जीवन हुआ था। इसके एक भागमें पद्य, एकरें गद्य और एकमें नाविल होता है। गद्यमें अच्छी उर्दूके नमूने होते हैं । इसकी कविताकी भापा अच्छी होती है। पुरानी चालका पत्र है। एक हिन्दू सजन उसे निकालते हैं, पर उसमें लिखनेवाले अधिक मुसलमान हैं। लखनऊसे दस बारह साल पहले मौलवी अबुलहलीम शररने "दिलगुदाज" नामका एक पत्र निकाला था। इसके सब लेख मौलवी [ ३०५ ] २०