पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३६

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साहित्याचार्य पं० अम्बिकादत्त व्यास तिवारीजीकी बनाई पुस्तकोंमेंसे हमारे पाम तीन हैं। एक “जयनारसिंहकी," दुसरी “धुढ़िया-बखान" और तीसरी "कबीर ।" हम किमी दृमरे लेबमें इनकी बात कहेंगे। यदि कोई मजन उनकी बनाई और पुस्तकोंका भी हमें पता दंगे तो हम बहुत आभारी होंगे। __-भारतमित्र १९०. ई. साहित्याचार्य पं० अम्बिकादत्त व्यास शीमें उदासी छाई हुई है ! बिहार शोकसे विह्वल है ! भारतवर्षकी शिक्षित मण्डलीके मुग्वांकी कांनि मलिन हो रही है । आरा, छपरा और बांकीपुरकी विद्वज्जन-मण्डलीकी आग्य डबडबाई हुई हैं ! हिन्दीसाहित्यकी फली-फुलवारीपर पाला पड़ गया ! भापा-कविताकी खिली वाटिकामें ओले गिर गये ! जिनकी यह दिव्य मूर्ति देखते थे, आज वह भारत-रत्न, साहित्याचार्य पण्डितवर अम्बिकादत्त व्यास इस संसारमें नहीं हैं ! बिलकते हुए बालक पुत्र, कन्याको छोड़कर, रोती हुई स्त्री और कुटुम्बियोंको छोड़कर, शोकप्रस्त-मित्रमण्डलीको छोड़कर गत मार्गशीर्प बढ़ी १३ मोमवारको गतके तीन बजे उन्होंने काशीपुरीमें प्राण त्याग किया। भगवान विश्वनाथकी पुरीमें उनकी राखकी ढंरी होगई ! ____भापाका वह अद्वितीय सुवक्ता अब नहीं है। वह वक्तृताके भिप मोहनी मन्त्र फूकनेवाला अब नहीं है । जो १० सालकी उमरसे साहित्यसंसारमें उदित होकर, अपनी अपार ज्योति फैला रहा था ; वह प्रतिभाशाली साहित्याचार्य अब इस संसार में नहीं है। आज भारत, रत्न-विहीन है, साहित्य, आचार्य-विहीन है, शास्त्र, व्यास-विहीन है, सनातन हिन्दूधर्म, अम्बिकादत्त-विहीन है। आज भारतकी वह चीज लुट गई है, जिसका फिर प्राप्त होना कठिन है ! चारों ओरसे लम्बी साँसके साथ यही सुनाई देता है कि हा! व्यासजी !