पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३६०

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हिन्दी-अखबार उक्त पत्र साप्ताहिक हुआ। तब खाली अंगरेजीमें निकलता था, उर्दू हिन्दी उठ गई थी। यह दशा जुलाई सन् १८६५ ईस्वी तक रही । गजा साहबके भारतवर्षमें लौट आने पर पहली नवम्बर सन् ५८८५ ईस्वीसे उक्त पत्र कालाकांकरसे हिन्दीमें दैनिक निकलने लगा। तबसे अब तक बराबर दैनिक निकलता है। इसका आकार एक शोट रायलके दो पन्ने हैं और मूल्य डाक महसूल सहिता १०) साल । जनवरी सन १८६१ ई० से प्रति रविवारको उक्त पत्रका एक नम्बर अंगरेजीमें छपने लगा। आगे प्रति सप्ताह दो नम्बर अंगरेजीमें और चार हिन्दीमें निकलने लगे। अब कई सालसे अंगरेजी हिन्दोस्थान सप्ताहमें तीन बार अलग निकलता है, जिसका मूल्य ६ साल है और हिन्दीका हिन्दोस्थान दैनिक अलग निकलता हैं । हिन्दो हिन्दोस्थानके सम्पादक राजा रामपालसिंहजी स्वयं हैं। यह पद उन्होंने अपने ही लिये रखा है। जितने लोग सम्पादक हुए वह सब सहकारी सम्पादक कहलाये। केवल पण्डित मदनमोहन मालवीय ही एक ऐसे सम्पादक हुए हैं, जिनके समयमें राजा साहब अपना नाम सम्पादकोंमें नहीं लिखाते थे। वह समय कोई दो तीन साल तक था। पण्डितजीके अलग होतेही राजा साहबका नाम सम्पादक और मनेजरकी जगह लिखा जाने लगा, जो आज तक बराबर लिखा जाता है। जिन लोगोंने हिन्दोस्थान पत्रके एडीटोरियल टाफमें काम किया है, उनमेंसे हम निम्नलिखित सज्जनोंके नाम जानते हैं- पण्डित अमृतलाल चक्रवर्ती, बाबू लाल बहादुर बी० ए०, पण्डित मदन- मोहन मालवीय बी० ए०, बाबू शशिभूषण चटर्जी बी० ए०, बालमुकुन्द गुप्त, पण्डित प्रतापनारायण मिश्र, बाबू गोपालराम गहमरनिवासी, पण्डित गुलाबचन्द चौबे । पण्डित रामलाल मिश्र इसके मनेजर थे, जो बहुत दिन तक मनेजरोका काम करते रहे। आजकल राजा रामपाल- [ ३४३ ]