पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३६२

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हिन्दी-अखबार ब्राडला बम्बईकी पांचवीं कांग्रसमें आये थे। पण्डित प्रतापनारायणजीने पद्यमें ब्राडलाका एक स्वागत लिखा था, जिसमें इस देशकी दशाकी तसवीर खंच दी थी। विलायतमें मि० फ्रेडरिक पिनकाट ने उस कविताको इतना पसन्द किया था कि उसका अङ्गरेजी अनुवाद करके इण्डिया पत्रमें छपवाया था। सारांश यह कि धनसे, वक्तृतासे और लेखोंसे राजा रामपालसिंह कांग्रसकी तरफदारी करते थे। अब कई वर्षसे उनकी वह पालिसी बदल गई है। अब वह कांग्रसके तरफदार नहीं हैं। अब उसकी बात तक हिन्दोस्थानमें नहीं उठती है। राजनीतिक चर्चा भी अब प्रायः नहीं होती। राजनीति सम्बन्धी आन्दोलनमें अब हिन्दोस्थान अपने पत्रोंका साथ नहीं देता। कभी-कभी देता भी है तो प्रतिकूल, यहां तक कि अब कभी उसके लेखोंका ढङ्ग इस देशक बाज एग्लो इण्यिन अखबारोंसे मिल जाता है। राजनीतिकी भांति समाजनीति तथा और कई बातोंमें हिन्दो- स्थानकी राय इस देशवालोंकी रायसे नहीं मिलती। वह सुधारक पत्र है और सुधार ठीक अगरेजी ढङ्ग पर चाहता है। अगरेजी चाल उसे बहुतही पसन्द है, अंगरेजी अनुकरण बहुत पसन्द है। उसके सम्पादक और मालिक राजा साहब अगरेजी पोशाक पहनते हैं। अगरेजी ढङ्गपर रहते हैं और अगरेजीही ढङ्गसे भोजन करते हैं। मांस आदिके बड़े तरफदार हैं। यहां तक कि कुत्ते, श्रीमानको अंगरेजीही पसन्द हैं। क्योंकि हिन्दुस्थानी कुत्तोंको आपके पत्रमें नामर्द और लेडी कहकर एकाध बार गाली दी गई है। कालाकांकर एक छोटासा गांव है, इतना छोटा कि उसकी जन- संख्या एक हजारके लगभग है। परन्तु रमणीय और सुखप्रद इतना है कि उसका वर्णन हमें एक अलग लेखमें करना होगा। तथापि एक दैनिक पत्रके योग्य वह गांव किसी प्रकार नहीं हैं। यद्यपि न हमें एक अलग लेखमें करना