पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३६७

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गुप्त-निबन्धावली संवाद-पत्रोंका इतिहास थे। और भी कितनीही तरहके फल वहाँ मिलते हैं। यह सब बहुत बढ़िया नहीं होते, तो भी खासे होते हैं। ___ गंगास्नानका जैसा सुग्ब वहाँ है, वैसा अन्यत्र कम देखनेमें आया। अकेली गंगा है, वहां तक उसमें यमुना भी नहीं मिली है। जल खूब स्वच्छ है। पक्के घाटका नाम नहीं। कच्च किनारों पर जहां चाहो स्नान करो। एक जगह घाटियेने एक तग्वतोंका घाट भी बना रखा है । उसीको वहाँका प्रधान घाट समझना चाहिये। स्नान-संध्याका वहां खूबही आराम है। वहांका जल खूब मीठा और पाचक है । पर गंगा- जल पीनेका वहाँ इतना अभ्यास हो जाता है कि उसके सामने कोई जल अच्छा नहीं मालूम होता। दो सालमें दो एक बारही शायद कूप जल पीनेकी नौबत आई हो। वह भी गांवमें नहीं, बनमें। उस समय “हिन्दोस्थान” पत्रका कोई आफिस न था। प्रेसमें छापनेके सिवा और किसी कामके लिये स्थान न था। वहां कभी-कभी प्रूफ देग्वनेके लिये जाना पड़ता था। एडिटर लोग अपने रहनेके स्थानों- हीमें अलग-अलग लिग्वते रहते थे । पण्डित मदनमोहनजी अपनी कोठी- के आगे एक उसारेमें बैठकर लिखते थे। हम लोग भी कभी-कभी वहीं पहुंच जाते थे। हम लोग अपने-अपने ठिकानेपर लिखते थे। मदन- मोहनजीके काम छोड़ देनेपर शशि बाबू, पण्डित प्रतापनारायण और हम बहुधा हमारेही स्थानपर एकत्र होकर लिखते थे। यह मेल बहुत दिन तक रहा। आरम्भमें कुछ दिन राजा साहबकी बारहदरीके ऊपरके मकानमें लिखनेका स्थान बनाया गया था। बड़ा अच्छा समय था । बड़े अच्छे दिन थे। बड़ी स्वाधीनता और बड़ी बेफिकरी थी। स्वप्नकी भांति वह पन्द्रह-सोलह सालका बीता हुआ जमाना याद आता है । वहां न मीलों लम्बी सड़कें थीं, न आकाशसे बानं करनेवाली ऊंची-ऊंची इमा- रतें थीं। न घोड़ा-गाड़ियों और ट्रामगाड़ियोंकी भड़भड़ थी, न मार्ग [ ३५०