पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३८९

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गुप्त-निबन्धावली संवाद-पत्रोंका इतिह लिखनेको पड़े हैं। इतिहास, समाज, धर्म, साधारण नीति आदिर लिखनेको तो कोई मना नहीं करता। मेवाड़-सा तो सुन्दर दे राजस्थानमें और नहीं है। वहांकी झील तालावोंका वर्णन, वह महलोंकी शोभा, वहांके दरबारों और उत्सवोंका वर्णन ऐसा नहीं है। साधारण रीतिसे लिखने पर भी लोगोंके मनोंको मुग्ध न करते उत्सवों पर वहां जिस ढङ्गके दरबार और सवारियां होती हैं, उन शान अब भी पुराने समयको याद दिला देती है। पर उदयपुरके पत्र ऐसी खबर होती भी हैं, तो दो तीन लाईनमें । गत २० अप्रैलको उदर पुरमें एकलिङ्गजीके वार्षिकोत्सवके उपलक्षमें 'दरीखाना' हुआ ४ हाथियोंकी लड़ाई हुई थी। यह एक बड़े ही ठाटका उत्सव उदयपुर होता है। उदयपुरके कागजमें उसकी खबर साढ़ेतीन लाइनमें छपी है ___ उदयपुरमें विद्वान रहते हैं, विद्यानुरागी रहते हैं। वहां ए अच्छी लाइब्रेरी है। उसमें विद्या सम्बन्धी बहुत कुछ समान है उसका प्रबन्ध एक बड़े योग्य पुरुषके हाथमें है, जिसने ऐतिहासि बातोंका पता लगानेमें बड़ा नाम पाया है। उसका नाम पण्डि गौरीशंकरजी है। जानी मुकुन्दलालजी हिन्दीके एक पुराने लेखक वा मौजूद हैं। रामनारायणजी दूगड़, फतेहसिंहजी मेहता, जोधसिंह मेहता जैसे उत्साही हिन्दीके प्रेमी और सुलेखक वहां मौजूद हैं। ऐ ऐसे लोगोंके होते उदयपुरका एक मात्र अखबार ऐसी दशामें क निकलता है ? जो अखबार स्वयं धीर वीर श्री महारा साहबकी आज्ञासे निकलता है, उसकी ऐसी गिरी हुई दशा क है ? वहांका पत्र तो ऐसा होना चाहिये था कि लोग उसके एक ए अक्षरको पढ़ते और उसके हर नये नम्बरके लिये टकटकी लगा रहते। क्या हमें सज्जनकीर्ति-सुधाकरकी उन्नतिकी कुछ आश् करना चाहिये ? [ ३७२ ]