पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/३९

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गुप्त-निबन्धावली चरित-चर्चा न समझ सकनेपर भी उनकी तेजस्विता तथा वक्तृताकी बड़ी प्रशंसा की। संवत् १९४७ में दिल्लीके पहिली बार वाले श्रीभारत-धर्म महामण्डलके ममय आपको प्रथम श्रेणीके महोपदेशककी मनद, “बिहार-भूषण" पदवी तथा सोनेका तमगा मिला। संवत् १६४६ में आप कलकत्त पधारे थे । फिर अगले वर्ष छुट्टी लेकर पंजाब और सिंधमें दौरा किया। महारनपुर, लाहौर, अमृतमर आदि बड़े बड़े नगरों में खूब व्याख्यान दिये । ___व्यासजीको बहुत-मी उपाधियां मिलीं। संवन १६५४ में काशीजी- को महामभामें कांकरौली-नरेशकी छापसे उनको “भारतरत्न'की उपाधि मिली । अवध-नरेशने उन्हें "शतावधान की उपाधि दी। सबसे अन्तिम उपाधि उनको श्रीभारत-धर्म-महामण्डलस "भारतभास्कर की मिली । हा शोक ! इमका मोनेका तमगा अभी विलायतमें बनही रहा है। वर्तमान दरभङ्गा-नरेश महाराज रमेश्वरसिंह यह तमगा उन्हें अपने करकमलसे पिन्हाते । परन्तु मौतने जल्दी की, उनके इम सम्मान- को हमलोग अपनी आंखोसे देव न मकं । व्यामजी एक विलक्षण योग्यताके पुरुष थे। कितनीही भापाएं जानते थे। हिन्दी-भाषाके जानने वालों में तो वह अद्वितीय थे ही, संस्कृतकं भी अच्छे पण्डित थे । बङ्ग-भाषामें वक्तता तक कर मकते थे । अंगरेजी भी जानते थे । काव्यक मिवा दर्शन-शास्त्र में भी वह बन्द न थे। न्याय, वेदान्त, सबमें दखल. था। बिलाड़ी बड़े पक्क थे । ताश और शतरञ्जमें अच्छे अच्छे खेलने- वालोंके कान काटते थे। गाने बजानेमें भी चुप न थे। सितार, हारमो- नियम बढ़िया बजाते थे। यहां तक कि जलतरङ्ग, नमतरङ्ग तक बजा डालते थे । कवितामें बड़ही चतुर और तीब्र | । संस्कृत कविता भी बड़ी तेजीके साथ करते थे। वक्तना बहुतही सुन्दर करते थे । बड़े मिष्टभाषी, मिलनमार पुरुप थे। एकही शरीरमें इतने गुण एकत्र होना एक देवी बातही है। हा! आज व्यासजीके जोड़का भारतवर्षमें एक [ २२ ]