पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४४९

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गुप्त-निबन्धारली आलोचना-प्रत्यालोचना मालूम हों, उन पर ध्यान द। आत्मारामको उत्तर देने में उनकी शान न घटती हो, तो कुछ उत्तर दें। कुछ भी न हो, तो जो उनके जीमें आवे सो करें और जो उनके मित्रोंके जीमें आवे सो वह करें। पर इतना जानले कि आडम्बर, दम्भ और धांधल मचानेसे साहित्यका कुछ सम्बन्ध नहीं है। न ऐसी बातोंसे कोई सच्ची बात दब सकती है। लिखने पढ़नेवालोंको अपना मन खूब साफ रखना चाहिये। अपनेको एकदम बहुत ऊंचा और दूसरोंको एकदम अनभिज्ञ कभी न समझना चाहिये। साथ ही यह भी देखना चाहिये कि मैं क्या कहता हूं और दूसरा क्या कहता है। यदि कोई सत्य बात प्रगट हो जाय, तो उसे अन्यायसे दबाना नहीं चाहिये और अपनी भूल हो तो उसे मान लेना चाहिये। खाली दूसरों पर दोष लगानेवाला ही पण्डित नहीं हो सकता और न अपनी भूल माननेवाला मूर्ख कहला सकता है । हमें इस विषयमें कुछ बोलनेकी जरूरत न थी, क्योंकि एक ओर द्विवेदीजीका लेख है दूसरी ओर आत्मारामके लेख, लोग पढ़कर आप फैसिला कर सकते हैं । पर कुछ लोगोंने भारतमित्र-सम्पादकको ही आत्माराम समझकर मनमें आया सो कह डाला है, इसीसे यह लेख लिखना पड़ा है कि आप सजनांको आत्मारामसे क्या मतलब है, उसके लेख हाजिर हैं। -भारतमित्र १६०६ ई०॥ [ ४१२ ।