पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४५०

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भाषाकी अनस्थिरता। -- - जो लोग समझते थे कि हिन्दी भाषा एकदम लावारिस है, कोई उसका मुरब्बी या सरपरस्त नहीं-वह यह खबर सुनकर खुश होंगे कि वास्तवमें उक्त भाषा मातापिताविहीन नहीं है। गत नवम्बर मासकी “सरस्वती' के देखनेसे विदित हुआ है कि उक्त पत्रिकाके सम्पादक पण्डित महावीरप्रसाद द्विवेदीजी हिन्दी भाषाके संरक्षक या वारिस दोमेंसे एक कुछ हुए हैं। इसके लिये हिन्दीके प्रेमियों और द्विवेदीजी महाराजको हम बधाई देते हैं। कहावत है कि बारह वर्षके पीछे घुरेके दिन भी फिरते हैं। उसके अनुसार अन्तको हिन्दीके दिन भी फिरे। बड़े ही अच्छे अवसरपर द्विवेदीजीने सरस्वतीकी उक्त संख्यामें “भाषा और व्याकरण" लिखकर अपनी हिन्दीदानोके झण्डे गाड़ दिये हैं। आपने साबित कर दिया है कि हरिश्चन्द्रसे लेकर आजतक जितने हिन्दी लिखनेवाले हुए हैं, सबकी हिन्दी अशुद्ध है। उन सबको इसलाहके लिये आपको स्वयं खलीफा या उस्ताद बनना पड़ा है और सबको एकही उल्टे उस्तरेसे मूंडना पड़ा है। सच है इस तरह किये बिना ठीक सफाई भी नहीं हो सकती। ___ लल्लू और लक्ष्मणसिंहको द्विवेदीजीने कुछ नहीं कहा। लल्लूको तो शायद इसलिये छोड़ दिया है कि स्वर्गीय पण्डित अम्बिकादत्त व्यास “बिहारी विहार” की भूमिकामें उसे ठीक कर चुके थे। फिर वह उर्दू- शु का जाननेवाला अर्द्धशिक्षित लल्लू द्विवेदी जैसे हमादां संस्कृतके अद्वि- तीय पण्डित, संस्कृत श्लोकोंके लासानी उच्चारक ( कोई सज्जन इसपर एतराज न करें, क्योंकि यह ईजादेवन्दा है ) अंगरेजीके परम पण्डितकी [ ४३३ ] २८