पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/४९४

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भाषाकी अनस्थिरता खयाल रहे कि "चल जाय तो है” कोई हिन्दीवाला नहीं बोलता। इसमें "अच्छा" जोड़े बिना कुछ अर्थ नहीं निकलता। यदि यह वाक्य किसी पत्रसे नकल किया गया हो, तो समझना चाहिये कि उसमें से "अच्छा ” छूट गया है। ___"को" की खराबीसे हिन्दीमें कुछ नये प्रयोग दिखाई देने लगे हैं। यहाँ तक कि “को” के परम प्रेमी द्विवेदीजी भी उन्हें देखकर घबराये हैं। वैसे प्रयोगोंसे युक्त नीचे लिखे चार वाक्य उन्होंने उदाहरणके लिये हिन्दीके अखबारोंसे उद्धृत किये हैं - (१) लाचार फौजकी सहायतासे गिरजा घेर लिया और उसको पकड़कर कैदखानेमें पहुंचाया गया। (२) एक स्त्रीको सिखा पढ़ाकर उन 'त्रियोंका भेद लेनेको भेजा गया। (३) लार्ड किचनरको प्रसन्न करनेके लिये लार्ड कर्जनको बेइज्जत किया गया। (४) यदि मुझे वालण्टियर नहीं बनाया जायगा, तो * * मैं

  • ॐ अभियोग उपस्थित करूंगा।

द्विवेदीजी बहुत तूल कलाम करके चाहते हैं कि यह वाक्य' इस प्रकार हों- (१) * * * 'वह पकड़कर कैदखानेमें पहुंचाई गई । (२) एक स्त्री * * * भेद लेनेके लिये भेजी गई। (३) * * * लार्ड कर्जन बेइज्जत किये गये। (४) यदि मैं वालप्टियर न बनाया जाऊंगा * * * चारों उदाहरणों में चार "को” उड़ाते ही वाक्य ठीक हो गये। चौथे वाक्यमें पूरा “को” नहीं है, पर अधूरा अर्थात् मुझकोकी जगह मुझे मौजूद है। द्विवेदीजी कहते हैं-“जान पड़ता है, इस तरहके प्रयोगोंको [ ४७७ ]