पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५०८

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आत्मारामीय टिप्पण 'केनोपनिषत्' मानो इसीकी महिमामें कहता है-- अन्यद् एव तद् विदिताद् अयो अविदिताद् अधि ।१।३ और फारसीवाला कहता है ... अय बरतर अज खयालो कयासो गुमानो वहम् । सारांश यह है कि अनस्थिरताको दृरसे प्रणाम करके पीछे हट जाना चाहिये। उसकी सिद्धि या बेसिद्धिका खयाल छोड़ देना चाहिये। चूहीने जाल काट दिया समयको पलटते देर नहीं लगती। यह समय भी बड़ा बाजीगर है। बड़े-बड़े तमाशे दिखाता गत जून मास चिल्लेकी गर्मियोंकी बात है कि द्विवदीजीने अपनी 'सरस्वती' में 'शीकरेशविलास' नामकी एक पोथीकी आलोचना छापी। उसमें ग्रन्थकर्ता पण्डित शिवदत्तके नामके साथ कविरत्न देखकर आप बड़े घबराये । पहिले तो आपने कविरत्नके आसपास डबल कामे लगाये। इतनेपर भी आपको सन्तोष न हुआ। आलोचनाके अन्तमें लिखा-“इस पुस्तकके कविने अपनेही मुंहसे अपनेको 'शिवदत्त कवीन्द्र' कहा है। सो क्यों, समझमें नहीं आया। यह तो कविकी तारीफ हुई। अब उनकी कविताकी सुनिये-“पहले उल्लासमें कालिदासको द्रुतविलम्बित रचनाकी खूब प्रतिस्पर्द्धा की गई है। इससे एक-आध जगह यमक साधनका यत्न करते समय अन्तिम चरणमें अर्थकी कुछ खींचतान हो गई है । आशा है, रावराजाजी इस सत्कविका अभीष्ट पूर्ण करेंगे। यदि पूरी पुस्तक नहीं, तो नीचेकी ही पंक्तियोंका [ ४९१ ]