पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५१८

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हिन्दीमें आलोचना थी, वैसी ही आत्मारामके मगजमें मौजूद थी। अर्थान् आत्माराम न केवल भारतमित्र-सम्पादक ही है, वरञ्च आपके मगजमें रखी हुई बातों- को उड़ा ले जानेकी शक्ति भी वह रखता है। आपने अपने पहले लेखमें भाषाकी "अनस्थिरता" दिखाने के लिये कुछ वेदान्तकी बहार दिखाई थी। आत्माराम बाबूने उस बेमौका वेदान्तकी कुछ दिल्लगी उड़ाई थी। अब द्विवेदीजी उस वेदान्तको मैक्समूलरका बताते हैं और मैक्समूलरके मरने पर भारतमित्र-सम्पादकने जो कविता लिखी थी, उसका हवाला देते हुए आत्मारामको भारतमित्र-सम्पादक समझकर ताना देते हैं कि तूने ही तो मैक्समूलरकी तारीफ की है और उसमें मैक्समूलरके लेखोंको "उचित आज्ञा" की सनद दी है। कहिये इतनी लम्बी दौड़का कहीं ठिकाना है! द्विवेदीजीसे विनय है कि उस कविताको फिर पढ़। वह “उचित आज्ञा' पुस्तकालयकी पुस्तकोंकी है, न कि खास मैक्समूलरके लेखोंकी । उस कवितामें पुस्तकोंके पढ़नेके लाभ भी पूरे न दिखाये जा सके । मैक्समूलरकी प्रशंमा तक तो वह पहुंची ही कहां? पर खैर, यदि वह मैक्समूलर ही की उचित आज्ञा हो, तो भी आपके दिमागमें बठे हुए मैक्समूलरको भारतमित्र-सम्पादक कैसे पहचानता ? भाषाके विज्ञानकी उत्पत्ति तो सौ सालसे हुई है, पराये दिमागमें घुसकर उसको छुपी बातोंको बमद्दे पेशगी जाननेका कोई विज्ञान निकला हो, तो हमें भी बताना। भला कुछ तो लाभ अब भी आपके प्रसादसे होना चाहिये। ___इसी प्रकार कपोल-कल्पित बातोंका किला बनाकर द्विवेदीजीने कयासी गोले मारे हैं। द्विवेदोजीने फरवरीके लेखमें यही जाहिर करना चाहा है कि भारतमित्र-सम्पादक ही आत्माराम है। "अन- स्थिरता" वाले लेख उसीने आत्माराम बनकर द्विवेदीजीसे पुरानी अदावतका बदला लेनेके लिये लिखे, न कि भाषा या व्याकरणकी भलाई- [ ५०१ ]