पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५२४

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हिन्दीमें आलोचना एक और आलोचकके विषयमें जो कम उमर था और उसका उसने नाम तक भी नहीं लिया, वह कहता है-That he discovers no mistakes I do not say. It would be marvellous if in such a multitude of propositions averaging a dozen per page I had made all criticism-proof. ___मैं यह नहीं कहता कि आलोचनामें उसने मेरी भूल नहीं निकाली ऐसा कहना अजीब होगा कि इतनी बड़ी पोथी लिखकर जिसके हरेक पृष्ठमें कमसे कम बारह सिद्धान्त हैं, मैंने उसके भूल घुसनेके सूराख तक बंद कर दिये। अधिकके लिये आप Essays volume III chapter JI देखें । देखिये स्पेनसर-सा विद्वान अपने आलोचकों पर आपकी तरह बिगड़ नहीं गया, वरञ्च धीरतासे उनको उत्तर देता रहा। ___यदि आपको यही बान पसन्द है कि केवल आत्मारामका पता लगाया जाय, उसकी बातोंको समझने और उसका उत्तर देनेकी कुछ जरूरत नहीं, तो अच्छा वही सही। इस बहानेसे आप भाषा और व्याकरणकी बहससे न भागिये, क्योंकि वह कामकी बात है। लीजिये आपकी तसल्लीके लिये हम मान लेते हैं कि इस बहसके समाप्त होने तक आत्माराम, भारतमित्र-सम्पादकही सही। जब आत्मारामके लेखोंको सम्पादकने अपने लेखोंके बराबर इज्जत दी है, उसकी बातोंका समर्थन किया है, तो उसको सम्पादक मान लेनेमें क्या हानि है ? पर क्या एक आत्मारामही भारतमित्र-सम्पादक है ? नहीं, नहीं, इस बहसमें जो कोई आत्मारामकी तरफदारी करता है, वही आपको भारतमित्र-सम्पादक दिखाई देता है । यहाँ तक कि पं. गिरिधर शर्माका, लेख नहीं तो भाषाही भारतमित्र-सम्पादककी है। इस बहमका क्या इलाज ? आपको यह विश्वास दिलाना कठिन है, कि आत्माराम भी कोई है और जिन सज्जनोंने उसकी 2... . -aim.