पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५३६

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हिन्दीमें आलोचना कर देते हैं-"२६ जनवरीका भारतमित्र पढ़नेसे मालूम हुआ कि पण्डित महावीरप्रसादजी द्विवेदो आजकल खब धर्मार्थ परिश्रम करते हैं। जिस प्रकार वह पहाड़ खोदकर चूहेका बच्चा निकाल रहे हैं, वह उन्हींका काम है । प्रयागको टेक्स्ट बुक कमेटीका सौभाग्य है कि उसके मनों भूसेको उड़ाकर दो-चार गेहूं के दाने दिखला देनेवाला एक आदमी बेकौड़ी-पैसे मौजूद है। xx तलाश करने जाओ तो संशोधक लोग बड़ी मुश्किलसे मिल सो भो गांठके टके खर्चने पर। यहां बेदाम काम होता है । यह भी एक अच्छा तमाशा है x x किसीकी संग्रह की हुई पुस्तकमें अन्य पुस्तकोंसे कुछ अंश उद्धत किये जायं, तो संग्रहकर्ताको उसमें संशोधन करनेका क्या अधिकार है, यह द्विवेदीजी बतावं ? कबीरकी पोथीमेंसे, दादूको पोथी- मेंसे , नानककी पोथीमेंसे यदि कोई कुछ संग्रह करे, तो उसको, उसके संशोधनका क्या अधिकार है । कबीर कहता है- अलख-पलकमें खप गया, निरंजन गया बिलाय । अवगत भजूं तो गत नहीं, भजू कौन सो लाय ॥ थकत-थकत जग थाकिया, थाका सबही खलक । देखत नजर न आइया, हारि कहा अलख ।। अब गिनें जरा द्विवेदीजी महाराज इन दोहोंकी मात्रा और कर इनका संशोधन। और बतावे हमको, कि क्या हक है उनको इनके संशोधन करनेका । 'खिलौना' लिखनेवालेने बच्चोंके पढ़नेके लिये गिलहरीका व्याह लिखा, बच्चोंकी कविता और बन्दरका ढोल, जीमै आया जैसे बजाया और मनमानी तान तोड़ी। 'हिन्दो शिक्षावली' बालेको क्या अधिकार है, जो उसका संशोधन करे ? x x x अथवा द्विवेदीजीको यह [ ५१९ ]