पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५३९

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गुप्त-निबन्धावली आलोचना-प्रत्यालोचना नहीं। साथ ही यह भी लिखा गया कि वह लेख अपना न था और का था। यदि आपने इससे कुछ रंज माना हो, तो क्षमा कर दीजिये । हमारी समझमें तो मामला रफा-दफा हो गया था, रंजकी कुछ बात न रही थी। उसके बाद कुछ दिन तक आप भारतमित्रमें लिखते भी रहे थे। यदि इसीको द्विवेदीजी ६ साल पहलेकी दुश्मनीं समझते हों, तो उनकी जबरदस्ती है। और कोई बात हो, तो कृपा करके वह बतावे ? नेकनजर और नेक नीयती गत ५ मईके अङ्कमें हमने लिखा था कि रामभजराम और द्विवेदीजीकी लिखा-पढ़ी फरवरी सन् १६०० तक समाप्त हो गई थी और उसके बाद २१ मई, सन् १६०० ईस्वी तक द्विवेदीजी भारतमित्रमें लिखते रहे थे। उस समय इस मामूली लिखा-पढ़ीका कुछ भी मैल उनके जी पर न रहा था। इसका और भी अधिक प्रमाण हमें मिला है। सन् १६०१ का 'भारतमित्र'का फाइल देखा, तो जान पड़ा कि उस वर्ष भी द्विवदीजी 'भारतमित्र'में लिखते रहे। उस सालकी १६ जनवरी, १६ फरवरी, २३ फरवरी, १६ मार्च, ३० मार्च, ६ अप्रैल और १३ अप्रेलके अटोंमें उनकी 'कुमार सम्भवसार' वाली कविता छपी है। इससे स्पष्ट है कि रामभजकी लिखा-पढ़ीके सवा साल बाद तक द्विवेदीजीकी लेखनीकी इस पत्रपर कृपा थी। अब यह कहनेकी जगह नहीं है कि हमसे उनसे कुछ दुश्मनी थी। पर द्विवेदीजी कहते हैं-- ___“आपकी बड़ी नेक-नीयती नई नहीं, ६ वर्षकी पुरानी है। जब उसका बेग बढ़ जाता है, तब वह, समय-समय पर कभी लेख, कभी नोट, कभी तसवीर आदिके रूपमें बाहर निकल कर आईनेके समान आपके साफ दिलको हलका कर दिया करती है ।" [ ५२२ ।