पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५५४

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हिन्दीमें भालोचना "मगज बढ़जानेका शायद यह फल हो, क्योंकि जिस इटालियन विद्वानने प्रतिभापर पुस्तक लिखी है, उसने मगजके बड़े हो जानेहीका नाम पागलपन रखा है।" | “लहंगा, नहीं-नहीं, बल्कि पंजाबका देहाती घाघरा। हमारा इरादा तो उसे ही रखनेका था, जिससे वह सितम पर सितम करता चला जाय, लेकिन कमबखत धोबिनने धोखा दिया। वह उसे लेकर कंकरीले घाटपर धोने चली गई। xxx यह तो कहिये कि आपकी लिखा- पढ़ीकी सारी खोलकर घाघरा पहनाया जाय, या नहीं ? प्रतापना- रायण ऐसे वन देहातीने जिस रूहके कालिबको हिन्दी सिखाई, वह क्यों न लहंगेका तरफदार हो।" गर्व "इस लेखमें आज हम भाषाके सम्बन्धमें सिफ उसकी अनस्थिरता पर कुछ कहेंगे, फिर उसकी स्थिरताके साधनभूत व्याकरणके विषयमें हम थोड़ोसी विवेचना करेंगे। इसके सिवा और भी दो एक बातोंका हम विचार करेंगे। भाषाके विषयमें हम जो कुछ कहेंगे उसमें सिर्फ मैक्समूलरके मतका अनुकरण करगे। यह हम इसलिये कहते हैं, जिसमें हमारे विश्वविजयी समालोचक, जो सुरगुरु बृहस्पतिको भी अपने सामने कोई चीज नहीं समझते, मैक्समूलरके भाषा-विज्ञान नामक बहुत बड़े ग्रन्थको पढ़कर ( अगर पढ़ सकते हों तो) इस लेखके साथ उसका भी खण्डन कर डालें।" _ “जो इतना भी नहीं जानता कि जीव और जीवनमें भेद है या नहीं और है तो क्या है, जिसकी आंख प्रकाशन और प्रकटनको देखकर दुखने लगती हैं, जिसकी समझमें 'ब' और 'व' का अन्तर अभी तक नहीं आया और जिसका पंचभूतात्मक प्रपञ्च भर्तृहरिका एकश्लोक सही- सही नकल तक नहीं कर सकता, उसका शब्दोंकी व्युत्पत्ति पूछना मानो