पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५६०

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अश्रुमती नाटक बताया कि यह पुस्तक वाहियात हुई है। ऐसी पुस्तकके जारी रहनेसे केवल बङ्ग-भाषाके साहित्यमें ही कलङ्क नहीं लगता, वरञ्च बङ्गदेशके पढ़े-लिखे लोगोंपर मी कलङ्क लगता है। बङ्ग-भाषामें अच्छे समाचार- पत्रोंकी कमी नहीं है, समझदार समालोचकोंकी कमी नहीं है, तिसपर यह पोथी इतने दिनसे जारी है। इसीसे हमने यह सिद्धान्त किया कि बङ्गाली लोग हिन्दुओं और हिन्दुस्तानियोंके चरित्र समझनेमें असमर्थ हैं। उनको इतनी भी खबर नहीं कि क्या चीज कलङ्क भरी है और क्या निष्कलंक ! हम 'अश्रुमतो' को भूल गये थे। इसका हिन्दी-अनुवाद पढ़नेसे हृदयमें जो वेदना हुई थी, उसे भी भूल गये थे। किन्तु दुर्भाग्यवश कलकत्ता बड़ाबाजार-पुस्तकालयमें बङ्ग-भाषाकी पुस्तकें देखते-देखते फिर वही 'अश्रुमती' हमारे हाथमें आ गई। इस बार हृदयका आवेग बहुत संभालनेपर भी संभल नहीं सका। हम उस पुस्तकको वहाँसे उठा लाये और बड़े कष्टसे अनिच्छापूर्वक उसे पढ़कर उसपर निशान किये। पढ़ते समय हमारे हृदयकी जो दशा हुई, वह वर्णन नहीं कर सकते। बार-बार उस पाप-भरी पुस्तकको हमने फेंक दिया, किन्तु फिर पढ़नेके लिये उठाया और किसी तरह समाप्त किया। हमारी समझमें नहीं आया कि इसके बनानेवालेने क्यों इस पुस्तकको बनाया है ? बनानेमें उसका उद्देश्य क्या था ? देशकी भलाई, समाजकी भलाई, साहित्यकी भलाई-तीनोंमें कौनसी बात इस पुस्तकके बनानेमें सोची गई ? यह वीररस, शृङ्गाररस, हास्यरस या करुणरस-किस रसकी पोथी है ? बहुत सोचा कुछ समझमें न आया! वह दुर्भाग्यका समय था कि जब टाड साहबकी बनाई हुई राजस्थान पुस्तक बङ्गदेशमें आई ! शायद टाडको यह खबर होती कि नामर्द बनाली जातिमें मेरी यह पुस्तक जायगी और उस नातिके नामर्द लोग इसको पढ़कर राजपूतोंके चरित्रको कलङ्कित करेंगे, तो वह कभी [ ५४३ ]