पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५६८

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अश्रुमती नाटक अश्रुमतीकी सखी मलिना पूछती है-"क्या तू कभी अपने माता- पिताको याद नहीं करती ?" उत्तरमें अश्रुमती कहती है-“बीच-बीच में मा-बाप याद आते हैं, पर सलीमको देखकर सब भूल जाती हूं।" । प्रतापके घरमें तो क्या, किसी अदनासे अदना क्षत्रियके घरमें भी कभी ऐसी पापिनी कन्या नहीं हुई, जो एक मुसलमानसे प्रेम करे और माता-पिताको भूल जाय। अश्रुमतो रोती हुई सलीमको अपना प्रेम जताती है-“सलीम ! सलीम ! क्या कहा सलीम ? तुम-जैसा मुझे चाहते हो, वैमा मैं तुम्हें नहीं चाहती ? तुम्हारे दर्शनको में दिन-रात आशा लगाये बैठी रहती हूं। स्वप्नमें तुम्हें देखकर माता-पिताको भी भूल जाती हूं।" ___ चाचा शक्तिसिंहसे अश्रुमतीकी बात होती हैं--- “शक्ति०-तू यदि नहीं जानती अश्रुमती ! तो सुन, सलीम मुसल- मान है, विधी है, राजपूतोंका परम शत्रु है, उससे हम लोगोंका कुछ सम्बन्ध नहीं। अश्रु० - चाचा ! यदि सचही वह राजपूतोंका शत्रु हो और शत्रु होकर भी मित्रका-सा काम करे, तो क्या उससे प्रेम न करना चाहिये ?" जब शक्तिसिंह अश्रुमतीको मारनेके लिये तलवार निकालता है, तो अश्रुमती कहती है,-"मारो चाचा ! मारो! हृदय पसार देती हूं। मुझे मारकर कलङ्कसे मुक्त हो ; मैं सलीमके सिवा किसीको नहीं चाहती ! शक्ति०- क्या ? सलीमसे ब्याह करेगी ? तू वही अश्रुमती है, पा और ? तूही क्या सूर्यवंशियोंकी लड़की अश्रुमती है ? तूनेही क्या घृणित मुसलमानको हृदय दिया है ? अश्रु०-हां चाचा ! दिया है, मुझे मारो।"