पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/५८६

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अधखिला फूल भी 'सर' नहीं बोलते हैं, जहां फारसी तरकीब आ जाती है--जैसे 'सर दर्द'। खाली होता है तो 'सिर' बोलते हैं। पोथीकी भाषाका जो अंश ऊपर उद्धृत किया है, उसमें कई एक मुहावरे भी गलत हैं। “कोई घरकी खुली छतोंपर ठण्डा हो रहा है।" इस वाक्यका वह अर्थ नहीं है, जो अयोध्यासिंहजीने यहां लगाया है, वरञ्च हिन्दीमें आदमीके लिये ठण्डा होनेका अर्थ मर जानेसे है। “पंखा हाँक रही है” न ब्रजभाषा है, न हिन्दी। हाँकनाका प्रयोग गाय, बैल आदिके साथ होता है। “रातमें जब सूरजका तेज नहीं रहता हमलोगोंको उनकी छवि देखनेमें आती है।" यह भी गलत है। “देखने में आती” की जगह “दिखाई देती है" चाहिये। यदि “देखने में आती है" रखा जाय तो “हमलोगोंको” उसमें से निकाल देना होगा। भूख-प्यासका डर नहीं, कमानेका खटका नहीं, इसमें कमानेके साथ खटका चल नहीं सकता, क्योंकि खटकेका अर्थ आशंका है। “कमानेकी चिन्ता नहीं” या “कमानेका खटराग नहीं" कहा जा सकता है। "उत्तर ओर यह जो अकेला चमकता हुआ तारा दिखाई पड़ता है जिसके आस-पास और कोई दूसरा तारा नहीं है यह ध्रव है।" एक ही वाक्यमें "तारा है" और ध्रव है ठीक नहीं होता।" उनके पास ही जो बहुत छोटा-सा तारा दिखलाई पड़ता है वह अरुंधती है। ** * * अपने पतिके चरणोंमें इनका बड़ा नेह था। एक ही वाक्यमें, एक ही शब्दके लिये एक वचनके साथ बहुवचन और वर्तमान- के साथ भूतकाल एकदम बेमेल है । ___ भूमिकामें अयोध्यासिंहजीने लिङ्ग-भेदके विषयमें जो बात लिखी हैं, उनमें भी कई बात ठीक नहीं हैं। “चाल चलन" सर्वत्र पुलिङ्ग है । आपने दिखाया है कि 'भारतमित्र में “तुम्हारी चाल चलन" लिखा गया था। यदि ऐसा लिखा गया हो तो वह भी गलत है। धरती, घनी-घनी कुञ्ज बेलं लहलहा रही हैं, आब, आदि सब शब्द ब्रजभाषाके होनेपर भी । ५६९ ]