पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६०५

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गुप्त-निबन्धावली सुट-कवि केहि कारन नरतनु दियो कृपासिन्धु भगवान ।। हमरे नर तनुते भले कीट पतङ्ग बिहङ्ग । हमरे नर तनुते भले बानर भालु कुरङ्ग । माख सुनी हम रामप्रभु जोर आपको पाय । यक बानर गढ़लंक महं दीनी लंक जलाय ।। और सुनी कपि सेन पुनि चढ़ी लङ्क पै धाय। पाथर खोदि समुद्र पै सेतु दियो फैलाय ।। कांप उठ राछस सबै डगमग डोली लंक । फिरत रामके जोरमें बानर भालु निसंक ।। खब कियो दससीसको गब आप महाराज । सुरगनकी चाही करी दियो विभीखन राज ।। और सुनी हम गीध इक लस्यो तुम्हारे हेत। जबलों तन महं बल रह्यो तज्यो नाहि रन खेत ।। बानर गीधहुंते गये प्रभु हम नरतनु पाय । नाथ तुम्हारे एकहू काम न आये हाय ।। नाथ कबहुं कछु आइहैं हमहूं तुम्हरे काम । ऐसो अवसरहूं कबहुं पावगे हम राम । तुम नहिं भूले रामप्रभु हमहीं भूले हाय । जहां तहां मारे फिरें तुमसो नाथ बिहाय ।। तन महं शक्ति न हीयमहं भक्ति हमारे राम । अधम निकम्मे आलसी पाजी डीलहराम ।। डूबत अम्बु-अगाध महं बेगि उबारो आय । हम पतितन को नाथ बिन - नाहिन आन उपाय ।। अब तुमसों बिनती यहै राम गरीबनवाज । इन दुखियन अंखियान महं बस आपको राज ।। [ ५८८ ]