पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६३०

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देव-देवी स्तुति (११) मातु आद्या शक्ति ज्योतिमय रूप तिहारो। विश्व प्रकाशिनि सब दिक है तेरो उजियारो। घोर तिमिरको पुंज चीर यह जगत दिखायो । अन्धकार महं परे हमें कछु समझ न आयो ।। जब कछु समझन चहें तबहि अति जी घबरावै । बिना तुम्हारी दया कौन यह भेद बतावै॥ -भारतमित्र, १५ अक्टबर १९०४ ई. जय लक्ष्मी जयति जयति लक्ष्मी जयति मा जग-उजियारी। सर्वोपरि सर्वोपम सर्वहू त अति प्यारी ।। व्यापि रह्यो चहुं ओर तेज जननी यक तेरो। तव आननकी जोति होत यह विश्व उजेरो॥ जहां चन्द्रमुखी मुखचन्द्रकी, किरन न उजियारो करें। तह तम न कटे युग कोटि लौं, कोटि भानु पचि पचि मरें। (२) "बिनतेरे सबजगत, जननि ! मृतवत् अरु निसफल" देवन बात कही यह सांचि छाड़ि छोभ छल । तोहि छाड़ि मा! देवन केतोही दुख पायो । सुरपति चन्द्र कुबेर हूते नहिं मिट्यो मिटायो । [ ६१३ ]