पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६६६

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शोभा और श्रद्धा यह हरियाली नाहिंन चहुं दिस उमड़ि उभारत गात भयो अपार अनन्द भूमिको, फली अंग न समात । बहु दिन बीते बाट निहारत हे नवघन चितचोर ! चाह भरी अंखियां सबहीकी लागी नभकी ओर । आज भई सीतल सो अंखियां, तो कहं सम्मुख पाय घर बाहर आंगन द्वारन आनन्द रह्यो अति छाय । तेरे ही दमकी है यह सब लहर बहर घनराय सूखे बन बीहड़ पहाड़ मग सबै उठे हरियाय । तेरी एक बून्द हे घन ! जीवन-जल-बून्द समान तुही देत सब जगकहं जीवन, हे जगजीवन प्रान । यह केते पायनका रौंदी सूखी झुलसी दूब हरी करी बरसाय अमिय ता ऊपर कीनी खूब । बाढ़त हैं पौधनरूपी-सिसु तेरो ही पय पाय अरु बूढ़े बूढ़ पेड़नको तू ही होत सहाय । कहा बताऊं प्यारे तोसों तेरे पयको जोर निकसत छुद्र अन्नको दाना परबतहू कहं फोर ! कुसुमित भये लता पल्लव बहु विपिन उठे अति फूल उमड़ि नदी इतराई डोलत भूल रही दोउ कूल । कबहुं देत धरनी कहं इक धानी सारी पहिराय कबहु खिले फूलनसों ताके मुख कहं देत खिलाय । पलटत नभ चढ़के इक छन महं भांति-भांतिके रंग साची कहो कहां यह सीखे भानमतीके ढंग ? जब तू चढ़त गगन पैहे घन करि निज मनकी मौज, गहरे दल बादलकी लीन्हें आगे पीछे फौज, धावत सोभा पावत मानहु मत्त गजनको झुण्ड