पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६७७

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गुप्त-निबन्धावली फुट-कविता अब क्यों मौन गयो प्रिय कोकिल आई बहुरि बहार ? अब दिन फिरे तुम्हारे प्यारे पंचम स्वरहि पुकार ॥ कूक वसन्ती कोकिल प्यारे हृदय खोलि कर कूक, करि अपने पिंजराके चाहे मेरे हियके टूक ! गाय गाय प्यारे पुनि वह स्वाधीन समयको राग ! वह पहली शोभा वसन्तकी वह सुचि सुन्दर फाग ! -भारतमित्र, १४ मार्च सन् १९०३ ई. मनुष्यकी लालसा। अमेरिका-युक्तराज्यके एक प्रेसीडेंटकी एक अंगरेजीको कविनाका भाव । “इस दुनियामें लोगोंको हैं कम चीज दरकार, वह भी थोड़े दिनको” यों कवि करता है निर्धार । पर मुझ पर तो नहीं ठीक होती कविकी यह टेर, है मेरे तो पास कोड़ियों इच्छाओंका ढेर । हर इच्छा मेरी हो जो एक सोनेकी टकसाल, तोभी और बढ़ेगा कुछ इच्छाओंका जंजाल ।। एक इच्छा है नित्य सजे यों मेरा दस्तरख्वान, मदिरावत समुद्रकी, कुदरतका पूरा सामान । मिलें फरासीसी उत्तम बावरची मुझको चार, अच्छे अच्छे भोजन मेरी खातिर हों तय्यार । नित्य चौगुना खाना खाऊं तोभी भूख न जाय, इच्छा मेरी इतने पर भी अधिक अधिक अधिकाय ।। [ ६६० ]