पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६८२

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बाल-विनोद प्रभात। चटक रहीं बागोंमें कलियां, पंछी करते हरंग रलियां। ग्वाल चले सब गायें लेकर, बालक पढ़ते हैं मन देकर, महक रही है खूब चमेली, भौंरे आये जान अकेली । सूरज ले किरनोंकी माला, निकला सब जग किया उजाला । ठण्डी हवा लगे अति प्यारी, क्या शोभा देती है क्यारी । पत्त यों ओससे जड़े हैं, जैसे मोती बिखर पड़े हैं। उठो बालको हुआ सवेरा, दूर करो आलसका डेरा । मुंह धोओ थोड़ा कुछ खाओ, फिर पढ़नेमें ध्यान लगाओ। खल और साधु । घूसों चूहोंका सदा देखो यह व्यवहार । जो पावै सम्मुख उसे करें काटके खवार ।। काठ बस्त्र जो कुछ मिले सबको डाल काट । अच्छे अच्छ द्रव्य हों या हों मैले टाट ।। पृथ्वी पर है यह सदा दुष्ट जनोंकी बान । अपना कुछ मत हो भला, कर पराई हान ।। पर सूईके सुगुण यह फटे वस्त्र दे जोड़। जहां फटा देख तहां रहे न मुंहको मोड़ ॥ जोड़ सोनेको सदा जले सुहागा आप । साधु सुहागा सम कर भला सहैं सन्ताप ।। सुई सुहागेसे सदा सीखो परउपकार । घूस मूसकी बान तुम कभी न सीखो यार । [ ६६५ ]