पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/६८७

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गुप्त-निबन्धावली स्फुट-कविता (३) पढ़ें हम सुखसे “लिटरेचर", सैंकड़ों कविता “शेक्सपियर”। गिबन ग्रेटोके सब इतिहास, पढ़ी पाई सबकी बूबास । पढ़े हैं कितनेही दरशन, लाक मिल बेन्थम हेमिलन । पढ़े हैं बहुत विवर्तनवाद, डारविन इस्पन्सरका नाद । सुने सीखे कितने लेकचर, लिबरटी लाजिक औ कलचर । किये कितनेही हासिल पास, किस तरह होगी पूरी आस ? फराडे हरशलका विज्ञान, हेक्सली टेण्डल करके ध्यान । सभीको करडाला है पार, पढ़े हैं नावेल कई हजार । लिटन थेकर डिकन्स इस्काट, डियूमा एंटानी लिये चाट । टरोलिप रिचर्डसन रेनल्ड, फील्डिङ्ग मंडे भी किये हल्ड । हुई हम विदुषी निकला नाम! फकत अब शोहरसे है काम । पश्चिमी विद्या आई रास, किस तरह पूरी होगी आस ? लिखे मैंने “डेन्सिङ्ग" के ढंग, और "सिङ्गिग” हैं उसके संग । बस अब देखू दिखलाऊंगी, और सीखू सिखलाऊंगी। सदा सुन्दर तितली बनकर, उडूंगी फूलों फूलों पर। कभी थियेटरमें जाऊंगी, फूल तुर ले आऊंगी। सभामें परीनान बनकर, डढूंगी कुरसीके ऊपर । सुना भी लाला मौधूदास, किस तरह पूरी होगी आस ? ........ पीतम सङ्गी होनकी तुम्हरे मन है चाह, हमरो तुम्हरो होय पै कैसे मित्र ! निबाह ? हमरे अंग लगी रहत पोमेटम परफ्यूम, [ ६७० ]