पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७०३

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गुप्त-निबन्धावली स्फुट-कविता सिद्धान्त। साधो भाई पांच हुए हम यार । नित बोतलकी नंया पर चढ़, होते हैं भव पार ।। अपने एक बराण्डी राजा शेम्पियन है रानी। कभी न डरं किसीसे औ नहिं करें किसीको हानी ।। नहीं तवक्को रखं किसीसे नहीं किमीकी परवा । मदिरा छूट किसीके कोई काम न आवे सरवा ।। क्यों गङ्गाजलमें है कीचड़ सागरका जल खारा ? जिससे मैला फीका जल पी जगत न जावे मारा ।। तुम नहिं हुए शेक्सपीयर हुआ, काहेसे कवि भारी ? यही जानलो वह पीता था सदा सुराकी झारी ।। कसे सुरगणने असुरोंको मार भगाया दादा ? सुर पीते थे लाल लाल भई असुर बिचारे सादा ।। इम भवके जङ्गलमें जो कोई है, सो बेगाना। एक सुरा है अपनी हमने निश्चय यह पहचाना ॥ हमें न देना गाली प्यारो और मना मत करना। हमें किसीका दूध दही घी चुरा पेट नहिं भरना ।। एक मजा केवल लूटंगे और न चाहें दूजा। नाचं गावं धूम मचाव कर मदिराकी पूजा ।। सब जाय। भाई सब जायरे जायरे जायरे। इस कलियुगके हेर फेरमें सारी बात बिलायरे । यह जाय ब्रह्मा वह जाय विष्णू और शङ्कर त्रिपुरारी।