पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७०४

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हंसी-दिल्लगी - दैत्य राक्षस देव यक्ष सबकी चलनेकी त्यारी ।। चले राम रावण दोनों ही राधाकृष्ण भवानी । रहे बिचारे ईश्वर बाकी तिनकी खेचातानी ।। मातों स्वर्ग नरक चौरासी हो गये एकमकारा । भीष्म द्रोण दुर्योधन नारद व्यास हो गये पारा ।। गये श्याम गोपी वह उनका मुरली मधुर बजाना । रह गये म्यूनिसिपलिटी आफिस थाना बोतलवाना। तन्त्र पुराण मन्त्र षटदर्शन वेद लबेद सिधारे । गीतामें लग गया पलीता, कर्म धर्म झक मारे ।। रहे डारविन, मिल, शेली, लड़कोंकी रही पढ़ाई । और रहो लड़कीकी शादी, जोरू सङ्ग लड़ाई ।। रही सड़ी दुर्गन्ध इंनकी और दूधमें पानी । चेचक हैजा ज्वर मलेरिया और पलेग निशानी ।। दिन नहीं कटता । दिन कटत नहीं क्या कीजेरे ? घरकी हवा मांस सो रोके, छन छन काया छोजेर ।। तास तडातड़ पीटत पीटत चिलम सड़ामड़ पीजेरे । पोबारा पच्चीस उड़ावत कैसे संध्या कीजेरे ।। खेल चुके शतरञ्ज गंजफा बाजी ऊपर वाजीरे । परनिन्दा भी करते करते दिन नहीं कटता पाजीरे । तब लाचार चरस गांजे गोलीसे प्रीत लगाईरे । ब्राण्डो ह्विस्की बीयर ताड़ी पी पी सांझ बनाईरे ।। बेवकूफ ब्रह्माने दिनको इतना बड़ा बनायारे । आयु बनाई इतनी छोटी दो दिन बीच सफायारे! [ ६८७ 1