पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७०६

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हंसी-दिल्लगी फिर इसके बाद दीपक इस धुनसे उसने छेड़ा । जल भुनके बस वहीं पर उसका मिटा बखेड़ा ।। अर्थात सबही निश्चय खाते वहाँपे गोता। और तानसेन खुद भी जलभुनके खाक होता ।। राजाके पास था पर वाटरपुरूफ अच्छा । और तानसेन पहले उठकर चला गया था । तबहीसे गीत उसके हैं सबके मुंह पे जारी । उस्ताद होगया वह सबकी नजरमें भारी ।। करते हैं श्राद्ध उसका मिलजुलके सब गवैये । अर्थान उसके गीतोंका हैं वह श्राद्ध करते ।। वह तो था एक मुसलमां कहती थी उसकी सुरत । उसके लिये भला थी क्या श्राद्ध की जरूरत ? साधो पेट बड़ा हम जाना, यह तो पागल फिरे जमाना । मात पिता दादा, दादी, घरवाली नानी नाना । सारे बने पेटकी खातिर, बाकी फकत बहाना ।। पेट हमारा हुण्डी पुर्जा पेटहि माल खजाना । जबसे जन्मे सिवा पेटके और न कुछ पहचाना ।। लड्डू पेड़ा पूरी बरफी रोटी साबूदाना । सब जाता है इसी पेटमें हलवा तालमखाना ।। यही पेट चटकर गया होटल, पीगया बोतलखाना । केला मूली आम सन्तरे सबका यही खजाना ।। [ ६८९ ]