पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७१४

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हंसी-दिल्लगी घरमें बैठे चनसे ग्वाओ, देस भेस चूल्हेमें जाओ। जिनपर है ईश्वरकी मार, उनका कुछ मत करो विचार। उनके तुम नीरे मत जाओ, अपनी ढोलक आप बजाओ। इतनी सुन बाबू हरवाय, मूछों पर दो ताव चढ़ाय । बोल ताऊ चोग्बी कही, बात तुम्हारी सबसे मही । यह कहकर गाड़ी मंगवाई, बठके बाबू हुए हवाई । बड़ पीपलमें पड़ी जंजीर, कोई लो तुक्का कोई लो तीर ।। दुसरा रंग एक रंग सबसे पचरंगा, जल गई धोती रह गये नंगा। कुरमी पर कुछ बैठे बाबू, और सामने बैठे हावू । हाबू बोल बाबू मुनो, कुर्मी छोड़ो सिरको धुनो। करते नहीं नरदमा माफ. बंटे हो बनके अशराफ । भागो मभी निकम्मे लोग, अव नहीं मिलता छप्पन भोग। इननी सुनकर बाबू भागे, आंख मसलते टेसू जागे।। तीसरा रंग धस धस धसके नैनीताल, माहब बीबी नाच बाल | धमक उमही पर पुनि चढ़, और नई कुछ युक्ती गर्दै । धसकत धसकत पहुंचे बंग, धस गये उससे दारजिलिंग । साहब देख बहुत घबराये, सारे साहब लोग बुलाये । बोलो यारो अब क्या करना, हजरत बोले कुछ मत डरना । ऊंचे बसोऔर भी चलकर, करो न जीमें मरनेका डर । मौत अगर आवे मर जाओ, जितने जीओ मजे उड़ाओ।। चौथा रंग जुग जुग जीओ टेसू राजा, सदा रहे झझी सिरताजा।