पृष्ठ:गुप्त-निबन्धावली.djvu/७२९

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गुप्त-निबन्धावली स्फुट-कविता आशीर्वाद टेसू आये लो असीस, भारत जीवे कोटि बरीस । कभी न उसमें पड़े अकाल, सदा वृष्टिसे रहे निहाल । अपना बोया आपही खावे. अपना कपड़ा आप बनावं । बढ़े सदा अपना व्यापार. चारों दिस हो मौज बहार । माल विदेशी दूर भगावं, अपना चरखा आप चलावे । कभी न भारत हो मुहताज, सदा रहे टेसूका राज ।। -भारतमित्र, ३० सितम्बर १९०५ ई. कर्जनाना झांझ झमाझम ढोल धमाधम कौन बजाता आया, सब कुछ उलट पलट कर डाला सब संसार कंपाया ? “वह मैं ही हूं" भटसे यों श्रीकर्जनने फरमाया, "आलीशान पुरुप हूं मुझसा कोई कभी न आया।" किसने मात किया “वरनम"को थियेटर में गर्राया, किमने दौर बादशाही फिर दिल्लीको दिखलाया ? कर्जन बोले “मैंने वह दिल्लीको खेल दिखाया, क्योंकि 'गाड'ने जीसे मुझको शान-पसन्द बनाया।" किसने सरकारी भेदोंको भयप्रद अधिक बनाया, किसने सुन्दर शिक्षाबिलको दुलकी चाल चलाया ? "निश्चय काम किया यह मैंने" बोले यों श्रीकर्जन, “सर्व शक्तिमय हूँ मैं मुझको कौन कर सके वर्जन ।" [ ७१२ ।