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106 : प्रेमचंद रचनावली-6
 

आज होरी के घर भोजन नहीं पका। न किसी ने बैलों को सानी- पानी दिया। सारे गांव में सनसनी फैली हुई थी। दो-दो चार-चार आदमी जगह-जगह जमा होकर इसी विषय की आलोचना कर रहे थे। हीरा अवश्य कहीं भाग गया। देखा होगा कि भेद खुल गया, अब जेहल जाना पड़ेगा, हत्या अलग लगेगी। बस, कहीं भाग गया। पुनिया अलग रो रही थी, कुछ कहा न सुना, न जाने कहां चल दिए।

जो कुछ कसर रह गई थी, वह संध्या-समय हलके के थानेदार ने आकर पूरी कर दी। गांव के चौकीदार ने इस घटना की रपट की, जैसा उसका कर्त्तव्य था, और थानेदार साहब भला, अपने कर्तव्य से कब चूकने वाले थे ? अब गांव वालों को भी उनका सेवा-सत्कार करके अपने कर्त्तव्य का पालन करना चाहिए। दातादीन, झिंगुरीसिंह, नोखेराम, उनके चारों प्यादे, मंगरू साह और लाला पटेश्वरी, सभी आ पहुंचे और दारोगाजी के सामने हाथ बांधकर खड़े हो गए। होरी की तलबी हुई। जीवन में यह पहला अवसर था कि वह दारोगा के सामने आया। ऐसा डर रहा था, जैसे फांसी हो जायगी। धनिया को पीटते समय उसका एक-एक अंग फड़क रहा था। दारोगा के सामने कछुए की भांति भीतर सिमटा जाता था। दारोगा ने उसे आलोचक नेत्रों से देखा और उसके हृदय तक पहुंच गए। आदमियों की नस पहचानने का उन्हें अच्छा अभ्यास था। किताबी मनोविज्ञान में कोरे, पर व्यावहारिक मनोविज्ञान के मर्मज्ञ थे। यकीन हो गया, आज अच्छे का मुंह देखकर उठे हैं। और होरी का चेहरा कहे देता था, इसे केवल एक घुड़की काफी है।

दारोगा ने पूछा-तुझे किस पर शुबहा है?

होरी ने जमीन छुई और हाथ बांधकर बोला—मेरा सुबह किसी पर नही है सरकार, गाय अपनी मौत से मरी है। बुड्ढी हो गई थी।

धनिया भी आकर पीछे खड़ी थी। तुरंत बोली-गाय मारी है तुम्हारे भाई हीरा ने। सरकार ऐसे बौड़म नहीं हैं कि जो कुछ तुम कह दोगे, वह मान लेंगे। यहां जांच-तहकियात करने आए।

दारोगाजी ने पूछा—यह कौन औरत है?

कई आदमियों ने दारोगाजी से कुछ बातचीत करने का सौभाग्य प्राप्त करने के लिए चढ़ा-ऊपरी की। एक साथ बोले और अपने मन को इस कल्पना से सन्तोष दिया कि पहले मैं बोला-होरी की घरवाली है सरकार ।

'तो इसे बुलाओ, मैं पहले इसी का बयान लिखूंगा। वह कहां है हीरा?'

विशिष्ट जनों ने एक स्वर से कहा-वह तो आज सबेरे से कहीं चला गया है सरकार।

'मैं उसके घर की तलाशी लूंगा।'

तलाशी! होरी की सांस तले-ऊपर होने लगी। उसके भाई हीरा के घर की तलाशी होगी और हीरा घर में नहीं है। और फिर होरी के जीते-जी, उसके देखते यह तलाशी न होने पाएगी, और धनिया से अब उसका कोई संबंध नहीं। जहां चाहे जाय। जब वह उसकी इज्जत बिगाड़ने पर आ गई है, तो उसके घर में कैसे रह सकती है? जब गली-गली ठोकर खाएगी, तब पता चलेगा।

गांव के विशिष्ट जनों ने इस महान संकट को टालने के लिए कानाफूसी शुरू की।

दातादीन ने गंजा सिर हिलाकर कहा-यह सब कमाने के ढंग हैं। पूछो, हीरा के घर में